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"भारतीय ज्ञान परंपरा में भूगोल' का उद्देश्य भारतीय साहित्य और परंपरा में निहित भौगोलिक दृष्टिकोण को समग्र रूप से प्रस्तुत करना है। इसमें वैदिक साहित्य से लेकर उत्तरवर्ती पुराणों एवं महाकाव्यों तक के उदाहरणों को संकलित कर यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि प्राचीन भारत में भूगोल केवल प्राकृतिक घटनाओं का वर्णन नहीं था, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन का भी आधार था।
पुस्तक की विषयवस्तु को अध्यायवार इस प्रकार संगठित किया गया है कि पाठक भारतीय ज्ञान परंपरा के विकासक्रम में भूगोल की भूमिका को क्रमशः समझ सके। प्रारंभिक अध्यायों में वैदिक एवं उपनिषदों में भूगोल का विवेचन प्रस्तुत किया गया है, तत्पश्चात् पुराण, जैन-बौद्ध ग्रंथों और महाकाव्यों में निहित भौगोलिक दृष्टिकोण का विश्लेषण किया गया है। अंत में आधुनिक भूगोल पर भारतीय परंपरा के प्रभाव और उसकी प्रासंगिकता पर चर्चा की गई है।
इस पुस्तक के लेखन का उद्देश्य केवल शैक्षणिक आवश्यकता की पूर्ति करना नहीं है, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा की उस अमूल्य धरोहर को सामने लाना भी है, जो आधुनिक भूगोल और पर्यावरणीय चिंतन में आज भी अत्यंत उपयोगी है। विश्वास है कि यह पुस्तक विद्यार्थियों, शोधार्थियों, अध्यापकों एवं भारतीय संस्कृति के अध्येताओं सभी के लिए उपयोगी सिद्ध होगी।"