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"नाट्यशास्त्र के अनुसार दृश्यकाव्य श्रव्यकाव्य की अपेक्षा अधिक प्रभावी होता है। अभिनय और संवादों के माध्यम से कथा की अभिव्यक्ति दर्शकों को बाँधती है, इसमें अधिक रंजना होती है।
बीसवीं सदी में सिनेमा के पदार्पण के बाद धीरे-धीरे पारंपरिक नाट्यकला धूमिल होने लगी। सिनेमा के बढ़ते प्रचलन ने दर्शकों को प्रेक्षागृहों से रजतपट की ओर खींच लिया। साहित्य में भी नाट्य-लेखन पर इसका प्रभाव पड़ा। नाटकों के बजाय सिनेमा की पटकथा की माँग बढ़ने लगी। अब तो ओ.टी.टी. का जमाना है। साहित्य में अन्य विधाओं की अपेक्षा नाटक विधा में कम लिखा जा रहा है। ऐसे में प्रीति सुमन ने नाट्य-लेखन में हाथ आजमाकर इस महत्त्वपूर्ण विधा को समृद्ध किया है।
प्रीति सुमन का यह प्रयास पाठकों का चित्त हरेगा। शब्दों की दस्तकारी और स्थापत्य किशोरों-युवाओं को मंचन के लिए अभिप्रेरित करेगा।
सहज-सुबोध भाषा की आंचलिक खुशबू संवादों को रुचिकर बनाती है, जिससे लेखिका की वाचिक शैली में संप्रेषणीयता की वृद्धि हुई है। आशा है, पुस्तक से गुजरने के उपरांत नवोदित लेखक नाट्य-लेखन की ओर उन्मुख होंगे।"