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"सदियों की परिवर्तन प्रक्रिया से परिवर्तित होती रही अयोध्या क्या वही है, जिसे आजकल जाना-समझा जाता है? अयोध्या बड़ी है, विराट् है। इसे कौन नहीं जानता! प्रश्न दूसरा है। क्या उस विराट् अयोध्या का आज कायाकल्प संभव है? असंभव तो कुछ भी नहीं है। सबकुछ संभव है। यही अयोध्या का संदेश है। यह पुस्तक उस संदेश का स्मरण है। यह स्मरण जितना प्रगाढ़ होगा, उतना ही अयोध्या का विराट् दर्शन सुलभ होता जाएगा।
यह पुस्तक कैसे बनी? इसे लेखकीय में बताया गया है। इस पुस्तक का पुरोकथन लिखते समय प्रथम ‘अयोध्या पर्व ’ की स्मृतियाँ मुखर हो उठी हैं। भारत की राजधानी में, वह भी सत्ता के शिखर लुटियन टीले के पास इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के परिसर में जो तीन दिवसीय आयोजन पिछले वर्ष हुआ। वह संत, विचारक, प्रचारक, राजनीतिक त्रेता और सामान्य जन की उपस्थिति से राष्ट्रीय उपनिषद् में परिवर्तित हो गया।"