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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अर्थ है-“अपनी इच्छा से राष्ट्र की सेवा करनेवालों का अनुशासित समूह” | इसीलिए देश की सीमाओं पर या देश के अंदर किसी भी संकट में स्वयंसेवक सबसे पहले और सबसे आगे खड़े मिलते हैं |
संघ की सबसे बड़ी विशेषता उसकी कार्यप्रणाली है | संघ की वृद्धि का कारण भी यही है | इसी से वह अन्य संगठन और संस्थाओं से अलग है | बाकी संस्थाएँ धरना-प्रदर्शन, वार्षिकोत्सव, धर्मसभा आदि के माध्यम से काम करती हैं; पर संघ की कार्यप्रणाली का केंद्र दैनिक शाखा और उसमें होनेवाले कार्यक्रम हैं |
स्वयंसेवक की पहचान उसके राष्ट्रीय विचार और सद्व्यवहार से होती है, किसी विशिष्ट वेश या बाहरी चिह्न से नहीं ।संघ हिंदू समाज में नहीं, हिंदू समाज का संगठन है ।इसलिए स्वयंसेवक समाज में बाकी सबकी तरह ही रहता है |
संघ की कार्यप्रणाली की एक बड़ी विशेषता उसका लचीलापन है। समय, स्थान और माहौल के अनुसार इसमें कई बार परिवर्तन हुए हैं । पहले सैन्य परेड, सैनिक गणवेश और शस्त्र प्रशिक्षण पर जोर रहता था; पर फिर खेल, योगासन और नियुद्ध आदि आ गए | गणवेश भी कई बार बदला है | इस लचीलेपन के कारण प्रतिबंधों के समय भी किसी-न-किसी रूप में संघ का काम चलता रहा।
विजय कुमार—जन्म : 1956 में।
शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र ।
छात्र-जीवन से ही लेखन, संपादन एवं सामाजिक कार्यों में रुचि। आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में रहे।
2000-2008 : सहायक संपादक 'राष्ट्रधर्म' (मासिक) लखनऊ।
2008-2016 : विश्व हिंदू परिषद्, केंद्रीय कार्यालय, दिल्ली में प्रकाशन विभाग से संबद्ध रहे।
2016-2024 : निदेशक, विश्व संवाद केंद्र, देहरादून।
प्रकाशन : छोटी-बड़ी 16 पुस्तकें प्रकाशित। 600 से अधिक लेख, व्यंग्य, निबंध आदि अनेक पत्र-पत्रिकाओं तथा अंतरजाल (इंटरनेट) पर प्रकाशित। नियमित लेखन का क्रम जारी।
साप्ताहिक 'पाञ्चजन्य' में 1992 से निरंतर तीस वर्ष छह पंक्तियों के काव्य- स्तंभ 'प्रशांत वाणी' का प्रकाशन। 2009 से 2016 तक पाक्षिक स्तंभ 'व्यंग्य बाण' भी प्रकाशित हुआ।
पर्यटन मंत्रालय की 'सिंधु दर्शन स्मारिका' में लेह-लद्दाख यात्रा-वृत्तांत प्रकाशित ।
अनेक स्मारिकाओं तथा विशेषांकों के संकलन व संपादन में सहयोग।
संप्रति : माधव सेवा विश्राम सदन, ऋषिकेश।