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"मुगल काल की पृष्ठभूमि में, विशेषकर औरंगजेब तथा उसके उत्तराधिकारियों के शासनकाल की घटनाओं पर रचित 'प्रतिरोध' एक ऐसी गाथाओं का संग्रह है, जिसमें कुछ महान् और साहसी पुरुषों द्वारा अपने आत्म-सम्मान, अपनी आस्था तथा जीवन-शैली की रक्षा हेतु एक अजेय व अविजित से प्रतीत होने वाले साम्राज्य के विरुद्ध निरंतर संघर्ष किया।
यद्यपि परिस्थितियों तथा भौगोलिक दूरी के कारण कोई प्रत्यक्ष तौर पर संगठित या संयुक्त प्रयास का आभास नहीं होता, तदापि वे परोक्ष रूप से एक-दूसरे के संघर्ष से लाभान्वित होते रहे। जब औरंगजेब राजपूताना में पूर्णतः उलझकर दबाव में आ गया, तो इस दौरान महान् शिवाजी तथा गुरु गोबिंद सिंह को अपने-अपने क्षेत्रों में अपनी क्षमताओं के पुनर्गठन और शक्तियों के सुदृढ़ीकरण का अत्यंत लाभदायक अवसर मिला। दक्कन में मुगलों को सबसे लंबे समय तक बाँधकर रखने का श्रेय मराठों को जाता है, जिनके कृत्यों ने राजपूतों, सिक्खों, बुंदेलों और जाटों के लिए भी जीवनरेखा का कार्य किया।
औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् सिखों और राजपूतों ने मराठों का यह ऋण बखूबी अदा किया, जब उन्होंने मुगलों को राजपूताना और पंजाब में पूरी तरह उलझाए रखा और इस प्रकार परोक्ष रूप से मराठों के लगभग निर्विरोध उत्थान का मार्ग प्रशस्त किया। इस दीर्घकालीन संघर्ष ने मध्यकालीन इतिहास के अनेक गुमनाम नायकों के सर्वोच्च बलिदानों को देखा। अद्वितीय साहस, धैर्य और दृढ़ संकल्प के बल पर वे उस शक्तिशाली साम्राज्य को घुटनों पर लाने में सफल हुए और अंततः उसके पतन का मार्ग प्रशस्त किया। यह पुस्तक इतिहास के ऐसे ही अनसुने वीरों व रणबांकुरों की शौर्यगाथा है।"