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"प्रणयवीणा' उपन्यास की भावात्मक अनुगूँज इसके समग्र कथ्य में अनुभव होती है। प्रस्तुति की रोचकता, मोहक दृश्य-विधान, घटनाक्रम व ऐतिहासिक सूक्ष्मता के कारण उपन्यास पूर्णतः पठनीय-संग्रहणीय है। प्रेम तथा करुणा के मर्मस्पर्शी प्रसंग इतने स्नेहस्निग्ध और भावार्द्र हैं कि अंतःकरण में उतरकर उनकी तरल विरलता अविरल रहती है। उपन्यास में काल्पनिकता व मौलिकता के परस्पर बंध कहीं ढीले नहीं पड़े, सत्य और तथ्य के जोड़ रचना में झलकते तो हैं किंतु कहीं वे खुले नहीं हैं।
उपन्यास का शैली-सौष्ठव उल्लेख्य है। चरितनायक उदयन की 'प्रणयवीणा' लेखक का प्रथित साहित्यिक योगदान है। ललित कला के उत्कृष्ट लालित्य तथा उसके अलौकिक स्वर्गारोह की धूप-छाँही बुनावट जितनी सूक्ष्म-विलक्षण है, उतनी ही वह भव्य भास्वर है।"