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यह पुस्तक स्वर्गीय श्री ओमप्रकाश पासवान के जीवन की एक प्रेरणादायक गाथा है, जो एक साधारण ग्रामीण परिवेश से उठकर जन-सेवा, नेतृत्व और मानवीय संवेदना के असाधारण प्रतीक बन गए। वे सेवा और समर्पण की अद्भुत मिसाल थे। पूर्वांचल के एक छोटे से गाँव से शुरू हुई उनकी यात्रा केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों तक सीमित नहीं रही; बल्कि उन्होंने अपने जीवन को समाज के सबसे कमजोर और जरूरतमंद लोगों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया।
श्री ओमप्रकाश पासवान जी ने पुलिस और रेलवे की नौकरी छोड़कर समाज-सेवा का मार्ग अपनाया, गरीबों के लिए निःशुल्क चिकित्सा-सेवा की स्थायी व्यवस्था खड़ी की, हजारों दिव्यांगों के लिए ऐतिहासिक शिविर आयोजित किए और हर जरूरतमंद के लिए बिना भेदभाव के खड़े रहे। ये सभी पहलू उनके व्यक्तित्व की ऊँचाई को दरशाते हैं।
ग्राम प्रधान और विधायक के रूप में उन्होंने सड़कों व पुलों तथा कन्या शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करते हुए विकास एवं पारदर्शिता की नई मिसाल स्थापित की। राम मंदिर आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका तथा महंत अवेद्यनाथ जी से उनके आत्मीय संबंध उनके संकल्प, आस्था नेतृत्व क्षमता को और भी सुदृढ़ बनाते हैं।
जनता के बीच 'गरीबों के मसीहा' और 'दानवीर' कर्ण के रूप में पहचाने जाने वाले ओमप्रकाश पासवान केवल एक नेता ही नहीं, बल्कि विश्वास, सेवा और समर्पण की जीवंत पहचान थे। उनका जीवन आज भी समाज के हर वर्ग को सेवा और समर्पण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।