Prabhat Prakashan, one of the leading publishing houses in India eBooks | Careers | Events | Publish With Us | Dealers | Download Catalogues
Helpline: +91-7827007777

Murti Bhanjan (PB)   

₹500

In stock
  We provide FREE Delivery on orders over ₹1500.00
Delivery Usually delivered in 5-6 days.
Author Kshama Kaul
Features
  • ISBN : 9789355211361
  • Language : Hindi
  • Publisher : Prabhat Prakashan
  • Edition : 1st
  • ...more

More Information

  • Kshama Kaul
  • 9789355211361
  • Hindi
  • Prabhat Prakashan
  • 1st
  • 2024
  • 368
  • Soft Cover
  • 450 Grams

Description

कौन कहता है मूर्ति में ईश्वर नहीं होता ? क्यों मूर्तियाँ तोड़ते हैं लोग ? मूर्ति की सँभाल मनुष्य से कई गुना अधिक कठिन है, श्रमसाध्य है, एकाग्रतापेक्षी है, ध्यानापेक्षी है। मूर्ति मनुष्य के कर्म लिखती है। यह सोचते हुए पुनः चिन्मयी यों सोचती, 'यह नीरा नहीं है। यह नीरा नहीं हो सकती। इतने प्रसन्न मुख, प्रसन्न चित्त। पीड़ा-पुंज होने के इतर भी। स्मिति की मूर्ति। दीप्ति की मूर्ति ।'

वे इस गाँव के खंडहरों में घूम रहे हैं और नीरा को लगता है कि वे कोई पुरातत्त्ववेत्ता हैं, जो खोए हुए शहरों को ढूँढ़ निकालते हैं, जबकि अभी-अभी उनका अपना शहर खंडहर हो गया है। उस वक्षस्थल के ठहराव पर उसके आगे घूमते हैं दिन भर देखे घर; जिनमें मानो अभी कुछ जीवित साँसें ले रहे हों। छतों और खिड़कियों से रिक्त घर। उनके दरारों से फूटती झाड़ियाँ और जंगली घास। काई, सीलन, लटकते जंग खाए ताले। पीले, मटमैले स्वस्तिक चिकन। उस एक घर में चमकता चक्की का पाट; फिर अगले घर में मिट्टी की परात और घड़ा। हम खंडहरों में ही क्यों घूम रहे हैं ? यह प्रश्न नीरा के उर से फूटा और गले तक आकर रुका।

'इस शामियाने पर बाजार की दिशा में एक बड़ा सा बैनर फड़फड़ाता था, 'कश्मीरी हिंदुओं का शरणार्थी कैंप' हिंदी भाषा में तथा 'कश्मीरी हिंदू रिफ्यूजी कैंप' अंग्रेजी भाषा में, ताकि दूर-दूर से भाग-भागकर आ रहे निर्वासित हिंदू दूर से देखकर विश्राम का अनुभव करें, इधर-उधर भटक भटककर और धूसरित न हों, जैसे चिन्मयी ने भी बस से उतरते ही देखा था, वह बैनर और चैन की साँस ली थी।

'हम हिंदुस्तानी अधिकांश भोले और नासमझ हैं, सो यह शामियाने वाला अपना शामियाना हटा गया, अभी वह ये बड़े-बड़े पतीले, भगौने भी ले जाएगा, जिनमें हम आपके लिए भोजन और नाश्ता बना रहे हैं, ताकि सरकार की तरफ से कोई सहायता मिलने तक आप जीवित रह सको" पर आप जरा भी न घबराएँ। आप हमारे बहुत कीमती अतिथि हैं। इस भारत में सिर्फ हम जानते हैं कि बेघर होना क्या होता है.. मेरी प्रार्थना है माताओं, बहनों, बच्चों, बूढ़ों, युवाओं से कि आप बिल्कुल न घबराएँ' गुप्ताजी ने शरणार्थियों से कहा।— इसी उपन्यास से

 

Review - 

अपने इस नवीनतम उपन्यास की अंतिम रूप से संशोधित पांडुलिपि को मुझे क्षमा कौल ने कई किश्तों में सुनाया।
एक महत्त्वपूर्ण मूर्तिशिल्पी स्त्री के जीवन-संघर्षों, सृजन की प्रक्रियाओं, उसके सपनों, उपलब्धियों, उसकी निश्छलताओं तथा उसके प्रेम, शोषण, जीवन दर्शन, बीहड़ यात्राओं, हताशाओं, टूटन एवं उसके हृदयविदारक अंत और निष्कर्ष पर यह एक विलक्षण उपन्यास बन पड़ा है।
कश्मीर की इस मूर्तिशिल्पी के जीवन में कैसे जिहादी आतंक भयंकर उथल-पुथल मचाता है और चित्त में प्रवेश कर बिना गोली इत्यादि के नष्ट कर डालता है। 
व्यक्ति, समाज और परिवेश के गहन मनोविज्ञान की पृष्ठभूमि में सभी चरित्र इतने जटिल हैं कि उनकी जटिलताओं की तमाम तहें और उनकी आनुषंगिक कथाएँ व अंतर्कथाएँ उपन्यासकार ने कैसे एक कुशल सूत्रधार की तरह समायोजित की हैं कि मैं आश्चर्यचकित रह गया।
अंत तक आते-आते मार्मिकता से इतना विह्वल हुआ कि बिलख-बिलख उठा।
मुझे विश्वास है कि ‘मूर्ति-भंजन’ अपने संपूर्ण ताने-बाने में कश्मीर की अंतरंग कथा कहता हुआ और जिनोसाइड के अछूते आयामों पर प्रकाश डालता हुआ विशेष कृति के रूप में प्रतिष्ठा पाएगा और एक अनूठा उपन्यास सिद्ध होगा।
—अग्निशेखर, जम्म

The Author

Kshama Kaul

क्षमा कौल
जन्म : 17 जुलाई, 1956 श्रीनगर, कश्मीर।
कश्मीर विश्व- विद्यालय से धूमिल पर एम-फिल के बाद पटना विश्वविद्यालय से हिंदी की युवा-कविता पर पी-एच.डी.। 
‘समय के बाद’ (डायरी, 1997-केंद्रीय हिंदी निदेशालय का राष्ट्रपति के हाथों सम्मान); ‘बादलों में आग’ (कविता-संग्रह, 2000); कश्मीर पर बहुचर्चित व लोकप्रिय उपन्यास; ‘दर्दपुर’ (भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित, 2004); इस उपन्यास का मराठी, गुजराती, कन्नड़, असमिया सहित अन्य कई भारतीय प्रमुख भाषाओं में अनुवाद); ‘आतंकवाद और भारत’ शोधपीठ, भोपाल से प्रकाशित (2012); ‘निक्की तवी पर रिहर्सल’ (उपन्यास, 2014); 'No Earth Under Our Feet' (हिंदी कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद) और ‘19 जनवरी के बाद’ (कहानी-संग्रह) सहित कई चर्चित पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानियाँ, समीक्षाएँ प्रकाशित। 
विस्थापन, जलावतनी, आतंकवाद, साहित्य, संस्कृति, राजनीति के समकालीन चरित्र, मानवाधिकार के सवालों पर नियमित लेखन तथा देशभर  के विश्वविद्यालयों में व्याख्यान। 
कश्मीरी-काव्य से अनेक महत्त्वपूर्ण कवियों की प्रतिनिधि कविताओं के हिंदी में अनुवाद। 
कश्मीर केंद्रित लेखों का एक संग्रह शीघ्र प्रकाश्य!
सन्ï 1990 से कश्मीर में जिहादी आतंकवाद और अलगाववाद के चलते अपने ही देश में शरणार्थी।
इ-मेल: khemakaul@gmail.com

Customers who bought this also bought

WRITE YOUR OWN REVIEW