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Kursi Too Badbhagini   

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Author Vijay Kumar
Features
  • ISBN : 9788177211269
  • Language : Hindi
  • Publisher : Prabhat Prakashan
  • Edition : 1st
  • ...more

More Information

  • Vijay Kumar
  • 9788177211269
  • Hindi
  • Prabhat Prakashan
  • 1st
  • 2011
  • 136
  • Hard Cover

Description

अब मैं कुरसी पर बैठता तो हूँ; पर रात में मुझे अजीब से स्वप्न आते हैं। कभी लगता है, कोई कुरसी खींच रहा है; कभी कोई उसे उलटता दिखाई देता है। कभी कुरसी सीधी तो मैं उलटा दिखाई देता हूँ। मैं परेशान हूँ; पर कुरसी आराम से है। जैसे लोग मरते हैं; पर शमशान सदा जीवित रहता है। ऐसे ही नेता आते-जाते हैं; पर कुरसी सदा सुहागन ही रहती है।
कुरसी की महिमा अपरंपार है। यह सताती, तरसाती और तड़पाती है; यह खून सुखाती और दिल जलाती है; यह झूठे सपने दिखाकर भरमाती है; यह नचाती, हँसाती और रुलाती है; यह आते या जाते समय मुँह चिढ़ाती और खिलखिलाती है।
यह वह मिठाई है, जिसे खाने और न खाने वाले दोनों परेशान हैं। जिसे मिली, वह इसे बचाने में और जिसे नहीं मिली, वह इसे पाने की जुगत में लगा है। धरती सूर्य की परिक्रमा कर रही है और धरती का आदमी कुरसी की। 21वीं सदी की आन, बान और शान यह कुरसी ही है।
कुरसी तू धन्य है। तेरी जय हो, विजय हो।
—इसी संग्रह से

The Author

Vijay Kumar

विजय कुमार—जन्म : 1956 में।

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र ।

छात्र-जीवन से ही लेखन, संपादन एवं सामाजिक कार्यों में रुचि। आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में रहे।

2000-2008 : सहायक संपादक 'राष्ट्रधर्म' (मासिक) लखनऊ।

2008-2016 : विश्व हिंदू परिषद्, केंद्रीय कार्यालय, दिल्ली में प्रकाशन विभाग से संबद्ध रहे।

2016-2024 : निदेशक, विश्व संवाद केंद्र, देहरादून।

प्रकाशन : छोटी-बड़ी 16 पुस्तकें प्रकाशित। 600 से अधिक लेख, व्यंग्य, निबंध आदि अनेक पत्र-पत्रिकाओं तथा अंतरजाल (इंटरनेट) पर प्रकाशित। नियमित लेखन का क्रम जारी।

साप्ताहिक 'पाञ्चजन्य' में 1992 से निरंतर तीस वर्ष छह पंक्तियों के काव्य- स्तंभ 'प्रशांत वाणी' का प्रकाशन। 2009 से 2016 तक पाक्षिक स्तंभ 'व्यंग्य बाण' भी प्रकाशित हुआ।

पर्यटन मंत्रालय की 'सिंधु दर्शन स्मारिका' में लेह-लद्दाख यात्रा-वृत्तांत प्रकाशित ।

अनेक स्मारिकाओं तथा विशेषांकों के संकलन व संपादन में सहयोग।

संप्रति : माधव सेवा विश्राम सदन, ऋषिकेश।

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