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जाति विहीन समाज का सपना जाति भारत की मिट्टी में से उपजी एक अभिनव संस्था है। एक प्रकार से जाति संस्था भारत का वैशिष्ट्य है। क्या जाति अभी भी प्रासंगिक है? उन्नीसवीं शताब्दी में जब आधुनिक औद्योगिक सभ्यता के भारत में प्रवेश ने जाति संस्था के पुराने आर्थिक और सामाजिक आधारों को काफी कुछ शिथिल कर दिया था, तब वह जाति संस्था बदलने के बजाय और मजबूत कैसे हो गई? ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने अपनी जनगणना नीति में जाति को इतना अधिक महत्त्व क्यों दिया? उन्होंने हमारे समाज की सीढ़ीनुमा जाति-व्यवस्था में सवर्ण, मध्यम और दलित वर्गों जैसी कृत्रिम विभाजन रेखाएँ क्यों निर्माण कीं? उनकी इस विभाजन नीति ने भारतीय राजनीति को किस प्रकार प्रभावित किया?.
देवेंद्र स्वरूप
जन्म : 30 मार्च, 1926 मुरादाबाद (उ.प्र.) के कांठ कस्बे में।
प्रारंभिक शिक्षा कांठ और चंदौसी के विद्यालयों में। लखनऊ विवि से इतिहास में एम.ए.। सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में सहभागी होने के कारण दो बार विश्वविद्यालय से निष्कासन हुआ। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से बी.एस-सी. करते-करते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पूर्णकालिक कार्यकर्ता बनने का संकल्प लिया।
कृतित्व : सन् 1947 से 1960 तक संघ के प्रचारक रहे। महात्मा गांधी की हत्या के पश्चात् संघ पर लगे पहले प्रतिबंध के दौरान 6 माह तक कारावास में बंदी। संघ की योजना से सन् 1958 में हिंदी साप्ताहिक ‘पाञ्चजन्य’ के संपादन से जुड़े। सन् 1964 में दिल्ली विश्वविद्यालय के पी.जी.डी.ए.वी. कॉलेज में इतिहास विभाग में प्राध्यापक नियुक्त हुए, सन् 1991 में सेवानिवृत्त। इस दौरान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के दिल्ली प्रदेश के अध्यक्ष रहे। सन् 1968 से 1972 तक अवैतनिक संपादक के रूप में ‘पाञ्चजन्य’ का संपादन कार्य भी किया। आपातकाल में फिर बंदी बनाए गए। सन् 1980 से 1994 तक दीनदयाल शोध संस्थान के निदेशक व उपाध्यक्ष रहे। इस दौरान संस्थान की त्रैमासिक पत्रिका ‘मंथन’ (हिंदी व अंग्रेजी) के संपादन का कार्य किया। इतिहासकार के रूप में भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् से भी जुड़े रहे। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में 2000 से अधिक प्रकाशित लेख। अपने जीवनकाल में पद-पुरस्कार-सम्मान के सभी आग्रहों को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार किया। राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री (मरणोपरांत) से सम्मानित।
स्मृतिशेष : 14 जनवरी, 2019।