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"कठिनाइयों की भट्टी में तपकर उभरे नाम युद्ध के नगाड़ों की तरह युगों-युगों तक गूंजते रहे। बिरसा मुंडा- 'छोटानागपुर के बाघ', उनकी आत्मा उस जंगल की तरह अदम्य थी, जिसे वे अपना घर कहते थे। रानी गाइदिन्ल्यू-'नागा नाइटिंगेल', उनकी आवाज स्वतंत्रता के लिए एक स्पष्ट आह्वान है। सिधू और कान्हू-उनके नाम दहकती आग के चारों ओर धीमे स्वर में फुसफुसाते हुए मॉनसूनी तूफान के प्रकोप के साथ संथाल विद्रोह का नेतृत्व कर रहे थे।
आदिवासी प्रतिरोध आंदोलन की सबसे बड़ी और प्रमुख विशेषता यह थी कि यह मूलतः विदेशी शासकों के विरुद्ध विद्रोह था और इस दृष्टि से यह राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन का अग्रदूत बन सकता था। जनजातीय आंदोलनों का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। मणिपुर, नागालैंड और मिजोरम सहित उत्तर-पूर्व में आंदोलनों का विश्लेषण करते समय अद्वितीय भू-राजनीतिक स्थिति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
यह जंगलों की सरसराती पत्तियों के माध्यम से फुसफुसाती हुई, भूले हुए रीति-रिवाजों की घंटियों में गूँजती हुई और उन समुदायों के उदंड लचीलेपन में अंकित एक गाथा है, जिसने अपनी पहचान अपने जीवन के तरीके को साम्राज्य की बाजीगरी के सामने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया। एक बेहद जानकारीपरक और पठनीय पुस्तक ।"