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Hindi Ke Divya Kaladhar   

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Author Acharya Ramchandra Shukla
Features
  • ISBN : 9788168342217
  • Language : Hindi
  • Publisher : Prabhat Prakashan
  • Edition : 1st
  • ...more

More Information

  • Acharya Ramchandra Shukla
  • 9788168342217
  • Hindi
  • Prabhat Prakashan
  • 1st
  • 2026
  • 200
  • Soft Cover
  • 200 Grams

Description

"आज की युवा पीढ़ी आचार्य रामचंद्र शुक्ल को हिंदी आलोचक और हिंदी साहित्य के इतिहासकार के रूप में जानती है। आचार्य शुक्ल का लेखकीय व्यक्तित्व इससे कहीं अधिक विराट है। उन्होंने इतिहास, अर्थ और सामाज विज्ञान जैसे विषयों पर भी लंबे-लंबे लेख लिखे हैं। इस तरह के लेखों को पढ़ते हुए प्रतीत होता है कि वे सिर्फ साहित्यिक विषयों पर ही अपनी लेखनी नहीं चलाते थे, बल्कि समाज जीवन से जुड़े विषयों पर लिखकर सामाजिक चेतना को धार देते थे।

अंतरराष्ट्रीय राजनय और कूटनीति पर लिखे उनके लेखों को पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि आचार्य शुक्ल इन विषयों के गहरे अध्येता थे। कई लेखों से गुजरते हुए लगता है कि वे आज के संदर्भ में लिख रहे थे। यही तो कालजयी लेखन है।

आचार्य शुक्ल भारत और भारतीयता का प्रखर स्वर थे। जब भी कहीं से भारत और भारतीय संस्कृति को लेकर कोई ओछी बात कही जाती थी तो वे तार्किकता के साथ उसका खंडन करते थे और ऐतिहासिक तथ्यों को प्रस्तुत करके मजबूती के साथ भारतीय संस्कृति को प्रतिस्थापित करते थे। यह अनायास नहीं है कि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने उनको 'हिंदी का दिव्य कलाधर' कहा था।"

The Author

Acharya Ramchandra Shukla

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म सन् 1884 को बस्ती जिले के अगोना गाँव में हुआ। सन् 1901 में प्रयाग के कायस्थ पाठशाला इंटर कॉलेज में एफ.ए. पढ़ने के लिए गए, परंतु गणित में कमजोर होने के कारण शीघ्र ही उसे छोड़कर ‘लीडरशिप’ की परीक्षा पास करनी चाही, उसमें भी वे असफल रहे। परंतु इन परीक्षाओं की सफलता या असफलता से अलग वे बराबर साहित्य, मनोविज्ञान, इतिहास आदि के अध्ययन में लगे रहे। उन्होंने हिंदी, उर्दू, संस्कृत एवं अंग्रेजी के साहित्य का गहन अनुशीलन किया।
उन्होंने ‘हिंदी शब्द सागर’ के साथ ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ का संपादन भी किया। सन् 1937 ई. में वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी-विभागाध्यक्ष नियुक्त हुए एवं इस पद पर रहते हुए ही सन् 1941 में उनकी हृदय गति रुक जाने से मृत्यु हो गई। 
उन्होंने ब्रजभाषा और खड़ीबोली में फुटकर कविताएँ लिखीं तथा एडविन आर्नल्ड के ‘लाइट ऑफ एशिया’ का ‘बुद्ध चरित’ के नाम ब्रजभाषा में पद्यानुवाद से किया। मनोविज्ञान, इतिहास, संस्कृति, शिक्षा एवं व्यवहार संबंधी लेखों एवं पत्रिकाओं के भी अनुवाद किए हैं। दर्शन के क्षेत्र में भी उनकी ‘विश्व प्रपंच’ पुस्तक उपलब्ध है। संपूर्ण लेखन में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण एवं कालजयी रूप समीक्षक, निबंध-लेखक एवं साहित्यिक इतिहासकार के रूप में प्रकट हुआ।

 

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