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"महात्मा गांधी ने स्वदेशी का मंत्र दिया था। आज इसमें खास तरक्की हुई है। अब पेप्सी कोला नामक अमेरिकी कंपनी इस देश में कोल्ड ड्रिंक की बोतलों के पहाड़ लगा देगी। बच्चे दूध की बजाय कोल्ड ड्रिंक माँगा करेंगे। चॉकलेट, ब्रेड, हैमबर्गर और कारों से लेकर पंचतारा होटलों तक इस नए स्वदेशी का बोलबाला होगा। अमेरिकी जींस हमारी नई पीढ़ी की राष्ट्रीय पोशाक होगी। स्टार टी.वी., सी.एन.एन. के अंतरराष्ट्रीय प्रोग्राम से हमारे टी.वी. को गांधीजी का स्वदेशी संस्कार दिया जा रहा होगा। कोष (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) का कर्ज स्वदेशी के राम नाम सत्य का समयबद्ध कार्यक्रम चलाता रहेगा।'
हाँ जी, यह स्वदेशी व्यंग्यों का संग्रह है-देखन में छोटे, पर गंभीर घाव करने वाले व्यंग्यों का संग्रह। ये व्यंग्य अपनी लोकप्रियता और प्रासंगिकता के लिए सदाबहार कहे जा सकते हैं।"
जन्म : 14 सितंबर, 1937, जोधपुर।
शिक्षा : एम. ए. (गोल्ड मैडल)।
श्री मिश्र पत्रकारिता के क्षेत्र में सन् 1962 में ही आ गए थे। सन् 1967 से लेकर 1974 तक वह ‘पाञ्चजन्य’ साप्ताहिक के साथ दिल्ली में रहे। पहले सहायक संपादक और अंतिम तीन वर्ष प्रधान संपादन। आपातकाल में वह जेल में रहे। ‘नवभारत टाइम्स’ में डेढ़ दशक तक ब्यूरो चीफ और स्थानीय संपादक आदि रहे। सन् 1 9 9 1 से लेकर अब तक वह स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय रहे हैं। इस बीच उनके कॉलम देश के पच्चीस समाचारपत्रों में प्रकाशित होते रहे हैं। जुलाई 1 9 9 8 में वह उत्तर प्रदेश से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए। उन्होंने ‘आर.एस.एस. : मिथ एंड रियलिटी’ सहित आधा दर्जन पुस्तकों की रचना की है। सन् 1977 में उन्होंने श्री अटल बिहारी वाजपेयी की आपातकाल में लिखी गई ‘कैदी कविराय की कुंडलियाँ’ का संपादन किया। आपातकाल में ‘गुप्तक्रांति’ नामक पुस्तक भी लिखी। ‘हर-हर व्यंग्ये’ और ‘घर की मुरगी’ नामक दो संकलन प्रकाशित। वह अपने को पत्रकार ही मानते हैं, साहित्यकार होने का दावा नहीं करते। इसी तरह राज्यसभा का सदस्य होने के बावजूद वह अपने को राजनेता नहीं मानते। उनका नियमित लेखन जारी है।