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"हिंदी साहित्य की उस जीवंत परंपरा से जुड़ीं मेहरुन्निसा परवेज अपने लेखन को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज से सतत संवाद की प्रक्रिया मानती हैं। उनके लिए साहित्य शब्दों का सृजन मात्र नहीं, बल्कि समय, समाज और मनुष्य के बीच पुल निर्मित करने की एक संवेदनात्मक साधना है।
उनके लेखन की मूल प्रेरणा सदैव उनके आसपास का समाज रहा है। विशेषतः छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र और जगदलपुर सहित आदिवासी बहुल अंचलों में बिताए गए अनुभवों ने उनकी दृष्टि को गहराई और विस्तार प्रदान किया। वहाँ के लोगों का जीवन-संघर्ष, उनकी सांस्कृतिक समृद्धि, मौन पीड़ा, सरलता और सहज मानवीयता ने उनके भीतर गहरे स्तर पर संवेदना का संचार किया।
उनकी रचनाओं में गाँवों की सादगी, सामाजिक विषमताओं की वास्तविकता, बदलते जीवन-मूल्यों का द्वंद्व और स्त्री-अनुभवों की जटिल परतें बार-बार उभरती हैं। वे मानती हैं कि साहित्य केवल समाज का दर्पण नहीं, बल्कि संवेदना को जाग्रत् करने वाली सृजनात्मक शक्ति भी है।
अब तक प्रकाशित उनके सभी उपन्यासों और कहानी संग्रहों में उनकी इस दीर्घ साहित्यिक यात्रा की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। उनके लिए लेखन किसी उपलब्धि का अंतिम बिंदु नहीं, बल्कि निरंतर चलने वाली मानवीय यात्रा है, समाज को समझने, उसके अनुभवों को शब्द देने और संवेदना की लौ को जीवित बनाए रखने की एक अनवरत साधना।"
आम नारी-जीवन की त्रासदियों को सहज ही कहानी का रूप देने में कुशल मेहरुन्निसा परवेज का जन्म मध्य प्रदेश के बालाघाट के बहेला ग्राम में 10 दिसंबर, 1944 को हुआ । इनकी पहली कहानी 1963 में साप्ताहिक ' धर्मयुग ' में प्रकाशित हुई । तब से निरंतर उपन्यास एवं कहानियाँ लिख रही हैं । इनकी रचनाओं में आदिवासी जीवन की समस्याएँ सामान्य जीवन के अभाव और नारी-जीवन की दयनीयता की मुखर उाभिव्यक्ति हुई है । इनको ' साहित्य भूषण सम्मान ' (1995), ' महाराजा वीरसिंह जू देव पुरस्कार ' (1980), ' सुभद्रा कुमारी चौहान पुरस्कार ' (1995) आदि सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है । कई रचनाओं के अन्य भाषाओं में अनुवाद भी हुए हैं । इनकी कुछ प्रमुख रचनाएँ हैं- आँखों की दहलीज, कोरजा, अकेला पलाश (उपन्यास); आदम और हब्बा, टहनियों पर धूप, गलत पुरुष,फाल्गुनी , अंतिम पढ़ाई, सोने का बेसर, अयोध्या से वापसी, एक और सैलाब, कोई नहीं, कानी बोट, ढहता कुतुबमीनार, रिश्ते, अम्मा, समर (सभी कहानी संग्रह) ।