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"तेजी और सावधानी सबसे बड़े हथियार थे। ये पचास वीर झपटते हुए औरंगजेब के खेमे में प्रवेश कर गए। पहले ही झटके में अनेक मुगल पहरेदारों को हताहत कर दिया गया। मुगल पहरेदारों ने भी तुरंत तलवारें खींच लीं और तुमुल युद्ध आरंभ हो गया। इस बीच संताजी ने औरंगजेब के खेमे की रस्सियाँ तलवार से काट दीं। आधार को गिरा दिया। विशालकाय वजनदार खेमा भर-भराकर नीचे ढह गया। खेमे के नीचे कुछ लोग दब गए, जिनकी चीखें सुनाई दीं।
मराठों ने समझा कि औरंगजेब भी खेमे के भीतर ही दब गया है और मारा गया है। खेमे के गिरते ही खेमे के ऊपर सजावट के लिए लगे विशाल स्वर्ण कलश तेज आवाज करते हुए नीचे गिर गए। संताजी ने तुरंत आगे बढ़कर इन स्वर्ण कलशों को खेमे से काटकर अलग कर दिया। अपनी विजय की निशानी इन स्वर्ण ट्रॉफियों को लेकर संताजी और दूसरे मराठा तुरंत सुरक्षित दिशा की ओर निकल गए, जिधर उनकी टुकड़ी के शेष सैनिक इंतजार कर रहे थे।
औरंगजेब की किस्मत उसके साथ थी। औरंगजेब उस समय अपनी पुत्री के खेमे में था। शोर-शराबा सुनकर वह जल्दी से बाहर आया और उसने गिरे हुए खेमे का नजारा देखा। उसकी तेज नजरों ने यह भी देख लिया कि स्वर्ण कलश गायब हैं।
- इसी पुस्तक से"