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"भारतीय संस्कृति में नदियाँ भारत की आत्मा हैं। जल संस्कृति ही जीवन संस्कार है। सनातन समाज में मुंडन संस्कार से लेकर अंतिम संस्कार तक सभी कर्मकांड नदियों के तीर्थक्षेत्र में होते हैं, जिसमें जल बचाने के लिए संकल्प की परंपरागत पद्धति अपनाई गई है। समस्त सृष्टि के लिए नदियाँ माँ और मौसी का ममत्व जल के रूप में प्रदान करती हैं।
नर को नीर की सुरक्षा करने की जरूरत है। चौरासी लाख योनियों में पंचतत्त्व को नुकसान किसी और जीव द्वारा नहीं पहुँचाया जाता, जितना कि नर ने पहुँचाया है। नर ही धर्म करता है, नर ही सुरक्षा करता है और नर ही इसको समाप्त भी करता है। इसलिए नीर को संरक्षित करने की आवश्यकता है। आज ग्लोबल वार्मिंग की चर्चा हो रही है, यह समस्या नर के कारण ही है।
इस पुस्तक में लेखकों द्वारा स्थान, पर्यावरण और जल-संस्कृति का सजीव चित्रण किया गया है। नदियों से मनुष्य का माँ और मौसी के गहरे भावनात्मक संबंध को स्थापित किया गया है। यह पुस्तक भारत की वैदिक संस्कृति को साक्ष्य के साथ प्रस्तुत करती है।"