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"पैंतीस वर्ष तक विजय प्रकाश ने वह मेज़ सँभाली, जिसके एक ओर अधिकारी बैठता है और दूसरी ओर आम आदमी खड़ा रहता है। 'उँगलियों को सोचने दो' की चौवालीस कविताएँ उसी मेज़ पर लिखी गईं-फ़ाइलों के बीच, दौरे से लौटती गाड़ी में और उन रातों में जब कोई देखा हुआ चेहरा सोने नहीं देता था।
यहाँ एक फ़ाइल अपनी व्यथा सुनाती है और कुरसी अपना सच बोलती है। यहाँ मुसहर टोले का श्रम है, चर्मकार का हुनर है और वह मज़दूर है, जो चाहता है कि महल के शिलालेख पर उसका भी नाम खुदे । यहाँ गर्भ में पल रही एक बेटी अपने अंतिम प्रश्न पूछती है और अहल्या पत्थर बनने से इनकार कर देती है और यहीं रीमान तथा आइंस्टाइन काल के सेतु पर मिलकर बातें करते हैं।
आठ खंडों में फैली ये रचनाएँ तैंतीस वर्षों की हैं। इनके केंद्र में एक ही आग्रह है-जो करता है, उसे सोचने का अधिकार भी मिले।"