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"तालिबान, जिसे किसी समय पर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के मदरसों से निकले लड़ाकों का अस्त-व्यस्त समूह माना जाता था, उसने अगस्त 2021 में तूफानी हमले के बाद अफगानिस्तान की सत्ता पर फिर से कब्जा जमाकर दुनिया को हैरान कर दिया। वर्ष 2001 में कुचले जाने के बाद भी इसने दुनिया की सबसे कुशल सेना को हराया।
यह पुस्तक बताती है कि तालिबान की उत्पत्ति कैसे हुई और यह कैसे आगे बढ़ा तथा इसकी वापसी इतने शक्तिशाली संगठन के रूप में कैसे हुई कि अरबों डॉलर खर्च करने और लगभग दो दशक लंबा सैन्य अभियान चलाने के बावजूद, सबसे शक्तिशाली सेनाओं वाले दुनिया के देशों को तालिबान के साथ सौदा करना पड़ा और शर्मनाक वापसी करनी पड़ी।
यह पुस्तक पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. की ओर से निभाई गई भूमिका के बारे में भी बताती है। साथ ही इस पर भी प्रकाश डालती है कि कैसे दीवार पर लिखी इबारत को न पढ़कर पश्चिमी ताकतें अपने ही जाल में फँस गईं !"
अरुण आनंद दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। देश के कई प्रमुख समाचार-पत्रों, समाचार एजेंसियों व टी.वी. समाचार चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके अरुण भारतीय राजनीति के विविध पक्षों के गहन विश्लेषण के लिए जाने जाते हैं। भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कई पक्षों पर उनके शोधपरक लेख प्रकाशित हुए हैं। अंग्रेजी, हिंदी व फ्रेंच पर समान अधिकार रखनेवाले अरुण अंग्रेजी में एक उपन्यास व भारतीय मूल के नोबल पुरस्कार विजेताओं की जीवनियों का संकलन प्रकाशित कर चुके हैं। इसके अलावा तीन पुस्तकों का अनुवाद अंग्रेजी से हिंदी में कर चुके हैं, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की पुस्तक ‘ऑडेसिटी ऑफ होप’ का हिंदी अनुवाद ‘आशा का सवेरा’ भी शामिल है। फिलहाल वे समाचार व विचार वेबसाइट के संपादक हैं और दिल्ली में अपने परिवार के साथ रहते हैं।