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"आत्मकथ्य
समय के इस सिंधु में है, बिंदु भर अस्तित्व मेरा इसलिए अभिमान भी करती नहीं मैं। प्राप्य जो मेरा रहा है, वह मुझे सब मिल गया है परम तृप्ति से हृदय का कलश नित भरती रही मैं।
छू न पाता है मुझे यह, नुपुल कोलाहल जगत् का क्योंकि अपने आप से संवाद होता निरंतर एक दुनिया साथ मेरे चल रही है जन्म से ही और भीतर पल रही है, दूसरी दुनिया समांतर
उम्र के सोपान चढ़ती जा रही हूँ अनवरत मैं कब कहाँ विश्राम होगा, यह अभी अज्ञात है आज तक जो भी रचा है सब उस रचयिता की कृपा है श्रेय की भागी बनी मैं यह अनोखी बात है
थी नहीं स्पर्धा किसी से, और ईर्ष्या भी नहीं हैं प्रभु के रूप में हम सब, सत्य मैं यह जानती हूँ राह में जो भी चले थे सब बंधु थे, सब मित्र ही थे आज मैं नव शीश ही आभार सबका मानती हूँ
- मालती जोशी (2023)"
सच्चिदानंद जोशी
जन्म : 9 नवंबर, 1963
पत्रकारिता एवं जनसंचार शिक्षा के क्षेत्र में अपने प्रदीर्घ अनुभव के साथ विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओं में कार्य। कलात्मक क्षेत्रों में अभिरुचि के कारण रंगमंच, टेलीविजन तथा साहित्य के क्षेत्र में सक्रियता। पत्रकारिता एवं संचार के साथ-साथ संप्रेषण कौशल, व्यक्तित्व विकास, लैंगिक समानता, सामाजिक सरोकार और समरसता, चिंतन और लेखन के मूल विषय। देश के विभिन्न प्रतिष्ठानों में अलग-अलग विषयों पर व्याख्यान। कविता, कहानी, व्यंग्य, नाटक, टेलीविजन धारावाहिक, यात्रा-वृत्तांत, निबंध, कला समीक्षा इन सभी विधाओं में लेखन। एक कविता-संग्रह ‘मध्यांतर’ बहुत चर्चित हुआ। पत्रकारिता के इतिहास पर दो पुस्तकों का प्रकाशन। प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक ‘सच्चिदानंद जोशी की लोकप्रिय कहानियाँ’ को भी अच्छा प्रतिसाद मिला। बत्तीसवें वर्ष में विश्वविद्यालय के कुलसचिव और बयालीसवें वर्ष में विश्वविद्यालय के कुलपति होने का गौरव। देश के दो पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालयों की स्थापना से जुड़े होने का श्रेय। भारतीय शिक्षण मंडल केराष्ट्रीय अध्यक्ष।