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"श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय-7 से 19 तक कुल 92 श्लोक हैं। इनमें से केवल दो श्लोकों में अर्जुन ने प्रश्न किए हैं, जबकि शेष 90 श्लोक श्री भगवान उवाच हैं, अर्थात् वे स्वयं भगवान् द्वारा कहे गए दिव्य उपदेश हैं।
इस पुस्तक में इन सभी 92 श्लोकों का विस्तारपूर्वक विवेचन प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक के प्रथम श्लोक में भगवान अर्जुन से कहते हैं-
'हे पार्थ ! अपने चित्त को मेरे में आसक्त करके, मेरे पर आश्रित होकर, योग का आचरण करते हुए; मैं जैसा हूँ वैसा ही संशय रहित होकर पूर्णतया जान सकते हो। कैसे ? अब उसे सुनो।'
इसी मूल विषय का विस्तार भगवान् ने अध्याय-7 से लेकर अध्याय 9 तक क्रमशः किया है। इन अध्यायों में ज्ञान, भक्ति और कर्म तीनों के समन्वय द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि जब साधक का चित्त परमेश्वर में स्थिर हो जाता है और जीवन योगमय बन जाता है, तब परम सत्य का साक्षात्कार संभव होता है। मृत्यु के समय ईश्वर स्मरण से कैसे परमेश्वर को पा सकते हैं, इसका भी विस्तार से उल्लेख है।
इन अध्यायों का सार है कि जहाँ परमेश्वर को जानना केवल बौद्धिक प्रयास नहीं, बल्कि समर्पण, साधना और कर्तव्यपूर्ण जीवन की स्वाभाविक परिणति बन जाता है।"