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"कहानी यथार्थ के धरातल पर लिखी गई वह दास्तान है, जो मानव-मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ जाती है। यह रेत की चादर पर उकेरे गए पाँव के चिह्न की भाँति है, जो भले ही वक्त की लहरों से मिट जाएँ, लेकिन अपने युग में ये उकेरे जरूर जाते हैं। यही तो खूबसूरती है इन कहानियों की कि ये मिटकर भी मिटती नहीं। इनका वजूद सदैव बना रहता है। आसमान के उस चाँद की भाँति, जो भले ही सूरज की रोशनी की भाँति ही दिन में धुँधला दिखता है, लेकिन रात की स्याह में मुसकराता है।
इस कहानी संग्रह 'समरसता' में उन दास्तानों को उकेरने की एक कोशिश की गई है, जो कभी अनसुनी सी रह गईं या वक्त की कोख में कहीं दब गईं। इसमें उन कहानियों का दमकता दर्पण भी है, जो चिंतन-भूमि तैयार करती हैं; जो समाज के ऊबड़-खाबड़ रास्तों को अपने ढंग से सँवारती हैं, सँजोती हैं। इस कहानी संग्रह में लिखा हर शब्द एक जीती-जागती दास्ताँ का पर्याय है। निश्चित तौर पर यह पुस्तक समाज के लिए चिंतन-भूमि तैयार करेगी। मनोरंजन की नाव में बैठाकर कानों में चुपके से कुछ कह जाएगी।"