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"कई बार तो सप्ताह-सप्ताह तक युवाओं के साथ साधना स्थली में साधना-रत रहते। युवाओं के साथ स्लीपर क्लास में दो-तीन दिनों की रेल यात्रा करते। जयप्रकाश जी हमेशा कहा करते थे कि ""युवाओं के साथ रहकर मैं अपने आप को युवा महसूस करता हूँ; इसलिए युवाओं के साथ रहता हूँ।"" किंतु उसके पीछे का उद्देश्य यही था कि युवाओं को अधिक-से-अधिक समय देकर उनके सर्वांगीण विकास पर ध्यान दिया जा सके।
जीवन के आरंभिक दिनों में ही जयप्रकाश जी ने निश्छल चेतना से निर्णय लिया था-सूर्या फाउंडेशन के निर्माण का। जयप्रकाश जी जानते थे कि अगर विवेकानंद के सपनों के भारत का निर्माण होगा तो वह आने वाली पीढ़ी के परिश्रम, त्याग, निष्ठा एवं ईमानदारी के आधार पर ही होगा।
जयप्रकाश जी अपने विद्यार्थी जीवन में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आए। विवेकानंद, महर्षि अरविंद, रविंद्रनाथ टैगोर को पढ़ने और मानने के बाद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रबुद्ध, त्यागी और समर्पित प्रचारकों के संपर्क ने मानो पूरा जीवन ही बदल दिया। समाज के प्रति दायित्व के निर्वहन की इच्छा प्रबल हो उठी।"