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पहर' जिसमें आप निराशा, हताशा और उम्मीद की झलक एक दिन के कई पहर में महसूस करेंगे। कैसे हँसती-खेलती गौरा अपने कठिन पहर का हिम्मत के साथ सामना करती है। कैसे रणविजय की दिन भर की उदासी एक फोन की घंटी से मुसकराहट में बदल जाती है और कैसे आराधना का एक गलत फैसला उसके हर पहर को मुश्किलों के साथ झेलने पर मजबूर कर देता है। इस पुस्तक में आप पहर के प्रचंड रूप और सरल रूप को देखेंगे कि कैसे एक पहर जिंदगी भर का जख्म भी देता है और खुशियाँ भी।