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"उन लोगों की दर्द भरी कहानी है, जिन्हें नियति ने अलग-अलग स्वनिर्मित द्वीपों में निर्वासित होने के लिए विवश किया है। इसमें अनेक संसारों को जोड़कर जिस नए संसार की संरचना की गई है-उसका अलग-अलग रूप ही नहीं, रंग ही नहीं, एक अलग पहचान भी है।
साकेत के माध्यम से अनेक आदर्शोन्मुख साकेतों के प्रतिबिंब मिलेंगे।
दीप 'दी के माध्यम से अनेक संघर्षरत दीप 'दी दिखलाई देंगी।
इसमें निहित 'पर के लिए स्वयं का विसर्जन भाव' बहुत कुछ सोचने के लिए विवश करता है।
सरल, सहज, स्वाभाविक घटनाओं के ताने-बाने से बुनी इसकी कहानी मात्र मानव-संबंधों की कहानी नहीं, बल्कि वर्तमान की जीती-जागती तस्वीर भी है। निर्वासित द्वीपों की निर्जन पृष्ठभूमि पर लिखी प्रस्तुत कृति अपने समय का एक प्रामाणिक दस्तावेज है-
एक चिरंतन चिरसत्य व्यथा-कथा भी।"
हिमांशु जोशी जन्मः4 मई, 1935, उत्तराखंड।
कृतित्व : यशस्वी कथाकारउपन्यासकार। लगभग साठ वर्षों तक लेखन में सक्रिय रहे। उनके प्रमुख कहानी-संग्रह हैं-'अंततः तथा अन्य कहानियाँ', 'मनुष्य चिह्न तथा अन्य कहानियाँ', 'जलते हुए डैने तथा अन्य कहानियाँ', 'संपूर्ण कहानियाँ, ‘रथचक्र', ‘तपस्या तथा अन्य कहानियाँ', ‘सागर तट के शहर' 'हिमांशु जोशी की लोकप्रिय कहानियाँ' आदि।
प्रमुख उपन्यास हैं-'अरण्य', ‘महासागर', 'छाया मत छूना मन’, ‘कगार की आग', 'समय साक्षी है', 'तुम्हारे लिए', ‘सुराज', 'संपूर्ण उपन्यास'। वैचारिक संस्मरणों में उत्तर-पर्व' एवं 'आठवाँ सर्ग' तथा कहानी-संग्रह ‘नील नदी का वृक्ष' उल्लेखनीय हैं। ‘यात्राएँ', 'नॉर्वे : सूरज चमके आधी रात' यात्रा-वृत्तांत भी विशेष चर्चा में रहे। उसी तरह काला-पानी की अनकही कहानी 'यातना शिविर में भी। समस्त भारतीय भाषाओं के अलावा अनेक रचनाएँ अंग्रेजी, नॉर्वेजियन, इटालियन, चेक, जापानी, चीनी, बर्मी, नेपाली आदि भाषाओं में भी रूपांतरित होकर सराही गईं। आकाशवाणी, दूरदर्शन, रंगमंच तथा फिल्म के माध्यम से भी कुछ कृतियाँ सफलतापूर्वक प्रसारित एवं प्रदर्शित हुईं। बाल साहित्य की अनेक पठनीय कृतियाँ प्रकाशित हुईं। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय अनेक सम्मानों से भी अलंकृत।
स्मृतिशेष: 23 नवंबर, 2018, दिल्ली।