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"कुंभ मेला सनातन धर्म का सबसे बड़ा धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पर्व है, जिसमें हमें एक ही स्थान पर संपूर्ण भारत का दर्शन होता है। प्रत्येक बारह वर्ष बाद शंकराचार्यों के नेतृत्व में हमारे मनीषी देश की नीति और नियम तय कर समाज को संचालित करते थे। ये नियम सनातन परंपरा को अक्षुण्ण रखने के साथ-साथ समय की माँग के अनुसार भी बनते थे।
कुंभ पर्व के दौरान माँ गंगा में स्नान का महत्त्व भी पुण्यफल देने वाला है। केवल स्नान कर लेने से कुंभ पर्व का उद्देश्य पूरा नहीं होता, जब तक ऐसे दिव्य आयोजनों में धर्म, संस्कृति, अध्यात्म, समाज एवं राष्ट्र के कल्याण जैसे विषयों पर वैचारिक आदान-प्रदान न हो।
आज जिस तरह राष्ट्रीय एकता और भावनात्मक एकता का प्रचार हो रहा है, वैसा इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। पर्यावरणीय दृष्टि से भी 'कुंभ' एक गहन संदेश संप्रेषित करता है। गंगा, यमुना तथा अन्य पवित्र नदियों के प्रति श्रद्धा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व और संवेदनशीलता का भी परिचायक है। कुंभ हमें यह स्मरण कराता है कि प्रकृति का संरक्षण ही मानव अस्तित्व की आधारशिला है।
इसी भावभूमि पर आधारित यह पुस्तक 'सनातन धर्म का दिव्य संगम' जनमानस में सामाजिक एवं नैतिक चेतना का जागरण करने वाला एक समग्र एवं सांगोपांग विमर्श है।"