₹250
"रोज़ सुबह देखता हूँ,
कम नहीं होते मगर,
हथेलियों पे खिचे
लक़ीरों के गुंजल।
गिरहें हैं कि खुलती नहीं।
सिरे हैं कि मिलते नहीं।
कितने और लम्हों का ख़ून पिएगी
इन गुंजलशुद लकीरो की काट?
देखूँ और कितने मुर्दा ख़्वाब ?"