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"यह पुस्तक उन महिलाओं की अनकही कथाएँ हैं, जिन्होंने बिहार में शास्त्रीय संगीत और लोकधुन, नृत्ये और रंगमंच को आज़ादी के बाद के साठ और सत्तर वर्षो में जीवित और जीवंत रखने में बड़ी भूमिका निभाई। हालाँकि कला-संस्कृति क्षेत्र में सक्रिय रहने के दौरान उन्हें कई तरह की सामाजिक-सांस्कृतिक चुनौतियाँ झेलनी पड़ीं, इसके बावजूद उन्होंने काम किया। बिहार की वर्तमान पीढ़ी आज कला-परंपराओं की जिस विरासत से समृद्ध है, यह उन्हीं भूली-बिसरी सी महिलाओं की देन है।
राज्य के कला-संस्कृति क्षेत्र की नायिकाएँ रही हैं वे महिलाएँ, लेकिन उनकी कहानियाँ, उनके योगदानों और उपलब्धियों की बहुत कम जानकारी रही है हमारे बीच। उन्हीं नायिकाओं की अनसुनी कथाएँ और उनके जीवन के कई अनकहे किस्से हैं इस संकलन में। यह पुस्तक इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह बताती है कि बिहार के सांस्कृतिक इतिहास में किन-किन महिलाओं की भागीदारी रही और किन-किन क्षेत्रों में उन्होंने विशिष्ट भूमिका निभाई।
इस संकलन में सर्वश्री विंध्यवासिनी देवी, सावित्री देवी और शारदा सिन्हा से लेकर नवनीत शर्मा, नूर फातिमा, शांति जैन, बेगम अजीजा इमाम, डॉ. रमा दास तथा उमा-गौरी चैटर्जी से लेकर कुमुद अखौरी, गिरिजा सिंह और शांति देवी तक शामिल हैं।"