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"यह पुस्तक क्यों ?
पाठकों के मन में यह सवाल उठ सकता है कि 19वीं शताब्दी के महान् संत स्वामी विवेकानंद का 21वीं शताब्दी की जेन जी पीढ़ी के बीच क्या संबंध हो सकता है। इस पुस्तक को लिखने का क्या तात्पर्य हो सकता है। प्रश्न स्वाभाविक है। मैंने स्वामी विवेकानंद के व्यक्तित्व और विचारों को समझने की यथासंभव कोशिश की है। उन पर पुस्तक भी लिखा है। बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल और भारत सहित अन्य देशों में जेन जी के आंदोलन को भी देखा है। उसके अंदर मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश और उसे बदलने की तीव्र इच्छा को भी समझने की कोशिश की है।
स्वामी विवेकानंद युवा वर्ग को एक बेहतर, सुसंस्कृत मानव सभ्यता के निर्माता के रूप में देखते थे। पूरब और पश्चिम के बीच, अध्याम और भौतिकता के बीच सामंजस्य के वाहक के रूप में देखते थे। उनके गुजरे हुए युग बीत गया, लेकिन उनका संदेश आज भी प्रासंगिक और शाश्वत है। यह युवा वर्ग के लिए है। जेन जी पीढ़ी तकनीकी रूप से दक्ष है। उसका दृष्टिकोण वैश्विक और वैज्ञानिक है। उसके अंदर जोश है। स्वामी विवेकानंद के विचार उनके इस जोश, उनके इस साहस और उनके इस व्यवस्था परिवर्तन की आकांक्षा को एक संयमित दिशा प्रदान कर सकते हैं। भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। लिहाजा वैश्विक परिवर्तन की कोई भी लहर भारत से ही उठ सकती है। यह मेरा मानना है।
इस पुस्तक को लिखने का मेरा उद्देश्य यही है कि युवा पीढ़ी का ध्यान स्वामी विवेकानंद के उस संदेश की तरफ जाए, जो उन्होंने उनके लिए रख छोड़ा है। शायद उन्हें अपने लक्ष्य को हासिल करने में सहूलियत हो।
- शंभू शिखर"