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"राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने स्वयंसेवकों की निर्मिति कर उन्हें समाज का जिम्मेदार नागरिक बनाता है तथा राष्ट्र-निर्माण के लिए प्रेरित करता है। संघ न चुनाव लड़ता है, न सत्ता माँगता है। जिस प्रकार एक दीप से हजार दीप जलते हैं, ठीक उसी तरह एक स्वयंसेवक से हजारों का जीवन बदलता है। एक शताब्दी में संघ रूपी बीज अब वटवृक्ष बन चुका है।
संघ ने अपने स्थापना काल से ही सदैव 'राष्ट्र प्रथम' का भाव रखते हुए सौ वर्षों की गौरवपूर्ण यात्रा पूरी कर ली है। संघ का सौ वर्षों का सफर भारत के स्वाभिमान, संस्कृति और समाज को जोड़ने की सतत साधना की गाथा है। संघ ने इन सौ वर्षों में स्वाधीनता की संघर्ष गाथा, देश के विभाजन की विभीषिका, अनेक आपदाओं एवं अनगिनत अच्छे-बुरे अनुभवों, लम्हों एवं संघर्षों को अपने में समेटा हुआ है।
संघ का स्वयंसेवक सदैव यह सोचता रहता है कि हमने राष्ट्र एवं समाज को क्या दिया है। राष्ट्र से कुछ लेने के बारे में स्वयंसेवक कभी सोचता ही नहीं है बल्कि वह कमजोर वर्गों के लिए काम भी करता है तथा ऐसा करके भ्रमित समाज के स्वभाव में परिवर्तन लाने का अथक प्रयास करता रहता है।
यह पुस्तक आम लोगों में संघ की भावनाओं, कार्यों एवं दृष्टिकोणों को जानने-समझने में रंचमात्र भी सहायक हो, इसी में इसके लेखन-प्रकाशन की सफलता है।"