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"कभी हम फोन चलाते थे, अब फोन हमें चला रहा है। एक समय था, जब सुबह की शुरुआत सूरज की रोशनी से होती थी, अब मोबाइल की स्क्रीन से होती है। पहले खिड़की के बाहर हरियाली देखी जाती थी, अब फोन के अंदर स्टोरी।
क्योंकि अब नशा शराब का नहीं, स्क्रीन का हो गया है। जिसे हम सुविधा मान बैठे थे, वह अब हमारी सहजता पर नियंत्रण कर रहा है। बच्चे अब मिट्टी से नहीं, मोबाइल गेम से खेलते हैं। युवा कॅरियर की तैयारी से ज्यादा रील एडिटिंग में व्यस्त हैं। दंपत्ती एक-दूसरे की आँखों में नहीं, फोन की स्क्रीन में झाँकते हैं। बुजुर्ग अब मंदिर की शांति नहीं, यूट्यूब की आवाज में खोए रहते हैं। यह पुस्तक शोर के बीच मौन ढूँढ़ने की कोशिश है। एक प्रयास है डिजिटल भी रहो, लेकिन डिसिप्लिन के साथ ।"