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"भारतीय अर्थनीति से साधारणतया प्राचीन भारत के अर्थ संबंधी कल्पनाओं अथवा आधुनिक भारत की अर्थव्यवस्था और नीतियों का बोध होता है। दोनों ही व्यापक और गंभीर चिंता के विषय हैं। प्रस्तुत पुस्तक में इस चिंता के निवारण का प्रयास नहीं किया गया है। इन विषयों पर अलग-अलग बहुत कुछ लिखा भी गया है। एक इतिहास की खोज का विषय रहा है तो दूसरा अर्थशास्त्री और राजनीतिज्ञों के विवेचन का।
अर्थशास्त्रियों ने सरकारी रिपोर्टों के आधार पर पाठ्य-पुस्तकें रची हैं तो राजनीतिज्ञों ने अपनी भूमिका के अनुसार अर्थव्यवस्था का चित्रण किया है। हाल में भावी की अनेक योजनाएँ भी प्रस्तुत की गई हैं। किंतु भूत के आधार पर वर्तमान का विचार कर भावी की दिशा निश्चित करने का प्रयास नहीं हुआ। इतिहासज्ञ, अर्थशास्त्री और राजनीतिज्ञ अलग-अलग विचार करते रहे हैं।
इन पृष्ठों का विचार समन्वयात्मक है, अत: एकांगी विचार करने वालों के लिए वह अधूरा और निराशाजनक ही रहेगा। जैसा कि पुस्तक के नाम से प्रकट होगा, यहाँ एक दिशा की ओर संकेत भर किया गया है। विकासोन्मुख भारत की मोटी रेखाएँ खींची गई हैं। अनेक छोटी-छोटी रेखाओं का अंकन एवं चित्र में रंग भरने का काम प्रकृति और पुरुष के द्वारा ही पूरा होगा। यह जैसे-जैसे होता जाएगा, चित्र वैसे-वैसे उभरता जाएगा। हमारा कर्तव्य है कि दर्शक की उत्सुकता छोडक़र निर्माता की लगन और पुरुषार्थ से उसमें जुट जाएँ।"