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"विधि द्वारा विरचित सृष्टि-मध्य
सरिताएँ भी हैं सागर भी।
कश्मीर-सदृश हिंद के शीश
पर रखी अमृत की गागर भी ।
ममतामयी माँ के आँचल सी
हरियाली इसमें विद्यमान।
महनीय चिंतनी चैत्यों का
है तना हुआ नभ में वितान ।
उर में अल्हड़ता अक्खड़ता,
बैठे, उन्नत गिरिवर, समेट।
बहुरंग वनस्पतियाँ बैठीं
सुषमाओं की साड़ी लपेट ।
बहुरूप स्वाद वाले फल
देने को आतुर हैं सघन वृक्ष।
कलियाँ, प्रसून खोले बैठे
गंध के कोष अलियों समक्ष ।"
आचार्य देवेन्द्र देव
शिक्षा : एम.ए. (संस्कृत), विद्या वाचस्पति।
कृतित्व : विश्व में सर्वाधिक पंद्रह महाकाव्यों, यथा ‘बांग्लात्राण’, ‘राष्ट्र-पुत्र यशवंत’, ‘कैप्टन बाना सिंह’ (सैन्य-वीरों पर), ‘गायत्रेय’ (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य), ‘युवमन्यु’ (स्वामी विवेकानंद), ‘ब्रह्मात्मज’ (नैमिषपीठाधीश्वर स्वामी नारदानंद), ‘हठयोगी नचिकेता’, ‘बलि-पथ’ (डॉ. हेडगेवार), ‘इदं राष्ट्राय’ (गुरु गोलवलकर), ‘अग्नि-ऋचा’ (डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम), ‘लोकनायक’, ‘लौहपुरुष’, ‘शंख महाकाल का’ (पं. श्रीकृष्ण ‘सरल’) और ‘बिरसा मुंडा’ एवं ‘पं. रामप्रसाद बिस्मिल’ (क्रांतिक विभूति) के अतिरिक्त गीतों, गजलों, छंदों, समसामयिक एवं बाल-कविताओं के ढाई दर्जन से अधिक संग्रह, लेख, कहानियाँ, संस्मरण, काव्यानुवाद एवं संस्कृत कविताएँ प्रकाशित/प्रकाशनाधीन।
देश-विदेश के प्रतिष्ठित चतुविंशाधिक सम्मानों से अलंकृत।