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"राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की यात्रा केवल एक संगठन की कहानी नहीं, बल्कि अनुशासन, सेवा और राष्ट्र-समर्पण के विचारों की एक सतत साधना है। इस यात्रा में नारी की भूमिका सहयात्री की रही है-कभी प्रत्यक्ष, कभी मौन; परंतु हर बार प्रभावशाली। उनका योगदान केवल औपचारिक सहभागिता तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि वह घर-परिवार, शिक्षा, समाज और जीवन के छोटे-छोटे कर्मों से लेकर राष्ट्रनिर्माण में निरंतर संलग्न हैं।
यह पुस्तक नारी के पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय प्रभाव को जीवंत रूप में सँजोने का विनम्र प्रयास है। स्त्री सहभागिता स्वतः ही संघ दृष्टिकोण में सर्वोपरि है, किंतु जहाँ पर कहीं चेतना की कमी है तो राष्ट्र सेविका समिति के माध्यम से उसके विस्तार के लिए संघ और समिति प्रयत्नशील हैं। तीन भागों में विभाजित इस पुस्तक में प्रथम भाग आत्मानुभूति और जीवन-प्रेरणा का स्वर है, जिसमें लेखिका ने बचपन से लेकर प्रौढ़ अवस्था तक संघ की विचारधारा से ओत-प्रोत जीवनवृत्त को कलम से उकेरा है। द्वितीय भाग विभिन्न सरसंघचालकों के संघ में नारी सहभागिता पर उनके चिंतन/प्रेरक वचनों/उद्धरणों का सार प्रस्तुत करता है, जो पीढ़ियों को दिशा देते रहे हैं। तृतीय भाग में देश की प्रतिष्ठित महिला विभूतियों के लेख हैं, कुछ सक्रिय सहभागिता के साथ, कुछ बिना औपचारिक जुड़ाव के, परंतु सभी संघ के उद्देश्यों से गहराई से प्रभावित।
ये पृष्ठ उस शक्ति को समर्पित हैं, जो राष्ट्रनिर्माण करती है और माँ मातृभूमि और जगन्माता बन वसुधैव कल्याण करती है।"