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Lokpriya Aadivasi Kavitayen   

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Author Vandna Tete
Features
  • ISBN : 9789351868774
  • Language : Hindi
  • Publisher : Prabhat Prakashan
  • Edition : 1
  • ...more

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  • Vandna Tete
  • 9789351868774
  • Hindi
  • Prabhat Prakashan
  • 1
  • 2017
  • 216
  • Hard Cover

Description

देश के चुनिंदा आदिवासी कवियों का यह संग्रह सामुदायिक प्रतिनिधियों के आदिवासी अभिव्यक्ति के सिलसिले की शुरुआत भर है। हिंदी कविता में पहली आदिवासी दस्तक सुशीला सामद हैं, जिनका पहला हिंदी काव्य-संकलन ‘प्रलान’ 1934 में प्रकाशित हुआ। आदिवासी लोग ‘होड़’ (इनसान) हैं और नैसर्गिक रूप से गेय हैं। अभी तक उनका मानस प्रकृति की ध्वनियों और उससे उत्पन्न सांगीतिक विरासत से विलग नहीं हुआ है। ‘होड़’ आदिवासी लोग गेयता और लयात्मकता में जीते हैं जो उन्होंने प्रकृति और श्रम के साहचर्य से सीखा है। प्रस्तुत संग्रह की कविताएँ ‘गीत’ रचनाएँ नहीं हैं, जो सामूहिक तौर पर रची, गाई, नाची और बजाई जाती हैं। लेकिन आदिवासी कविताओं की मूल प्रकृति ‘गीत’ की ही है, जिसका रचयिता कोई एक नहीं बल्कि पूरा समुदाय हुआ करता है; जिसमें संगीत और नृत्य की अनिवार्य मौजूदगी होती है और जिनके बिना गीतों का कोई अस्तित्व नहीं रहता। संग्रह में शामिल कविताएँ ‘गीत’ सृजन की इस सांगीतिक परंपरा को अपने साथ लेकर चलती हैं और ‘गीत’ नहीं होने के बावजूद ध्वनि-संगीत की विशिष्टता से खुद को गीतात्मक परंपरा से बाहर नहीं जाने देतीं।
दुलाय चंद्र मंडा, तेमसुला आओ, ग्रेस कुजूर, वाहरू सोनवणे, रामदयाल मुंडा, उज्ज्वला ज्योति तिग्गा, महादेव टोप्पो, इरोम चानू शर्मिला, हरिराम मीणा, कमल कुमार तांती, निर्मला पुतुल, अनुज लुगुन, वंदना टेटे और जनार्दन गोंड की कविताओं का संकलन।

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अनुक्रम

आदिवासी कविताएँ प्रतिपक्ष नहीं, उपचार हैं—7

1. दुलाय चंद्र मुंडा—15

2. तेमसुला आओ—21

3. ग्रेस कुजूर—32

4. वाहरू सोनवणे—45

5. रामदयाल मुंडा—52

6. उज्ज्वला ज्योति—84

7. महादेव टोप्पो—96

8. इरोम चानू शर्मिला—108

9. हरिराम मीणा—119

10. कमल कुमार ताँती—143

11. निर्मला पुतुल—152

12. अनुज लुगुन—164

13. वंदना टेटे—188

14. जनार्दन गोंड—199

कवि-परिचय—208

The Author

Vandna Tete

आदिवासियों का ‘कहना’ बिखरा हुआ है, बेचारगी और क्रांति, ये दो ही स्थितियाँ हैं, जिसकी परिधि में लोग आदिवासियों के ‘कहन’ को देखते हैं। चूँकि गैर-आदिवासी समाज में उनका बड़ा तबका, जो भूमिहीन और अन्य संसाधनों से स्वामित्व विहीन है, ‘बेचारा’ है, इसलिए वे सोच भी नहीं पाते कि इससे इतर आदिवासी समाज, जिसके पास संपत्ति की कोई निजी अवधारणा नहीं है, वह बेचारा नहीं है। वे समझ ही नहीं पाते कि उसका नकार ‘क्रांति (सत्ता) के लिए किया जानेवाला प्रतिकार’ नहीं बल्कि समष्टि के बचाव और सहअस्तित्व के लिए है। जो सृष्टि ने उसे इस विश्वास के साथ दिया है कि वह उसका संरक्षक है, स्वामी नहीं।
इस संग्रह की कहानियाँ आदिवासी दर्शन के इस मूल सरोकार को पूरी सहजता के साथ रखती हैं। क्रांति का बिना कोई शोर किए, बगैर उन प्रचलित मुहावरों के जो स्थापित हिंदी साहित्य व विश्व साहित्य के ‘अलंकार’ और प्राण तत्त्व’ हैं।


एलिस एक्का, राम दयाल मुंडा, वाल्टर भेंगरा ‘तरुण’, मंगल सिंह मुंडा, प्यारा केरकेट्टा, कृष्ण चंद्र टुडू, नारायण, येसे दरजे थोंगशी, लक्ष्मण गायकवाड़, रोज केरकेट्टा, पीटर पौल एक्का, फांसिस्का कुजूर, ज्योति लकड़ा, सिकरा दास तिर्की, रूपलाल बेदिया, कृष्ण मोहन सिंह मुंडा, राजेंद्र मुंडा, जनार्दन गोंड, सुंदर मनोज हेम्ब्रम, तेमसुला आओ, गंगा सहाय मीणा और शिशिर टुडू की कहानियाँ।

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