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"निकिता नरेड़ी का यह संस्मरण आपको एक ऐसे सफर पर ले जाता है, जो पुत्र-प्रधान समाज में निःसंतान महिला होने की भयावह वास्तविकता को उजागर करता है।
डॉ. नरेड़ी जैसी प्रजनन (IVF) विशेषज्ञ के लिए संतान न होना केवल निष्क्रिय प्रजनन अंगों की समस्या नहीं है, जिसे इंजेक्शन और हार्मोन देकर या प्रयोगशाला में जटिल प्रक्रियाओं के माध्यम से ठीक किया जा सके, बल्कि यह असहज बातचीत, साथी और परिवार के साथ बदले हुए रिश्तों का एक जटिल मिश्रण है। यह व्यक्ति के विश्वास और आस्था प्रणाली पर सवाल उठाता है। ""क्या मैं सिर्फ एक शिशु पैदा करने वाली मशीन हूँ?"" के माध्यम से लेखिका जीव विज्ञान, भावनाओं और सामाजिक अपेक्षाओं के इस उथल-पुथल भरे मेल को सामने लाती है।
निःसंतानता एक ऐसी बेड़ी है, जिसमें कोई भी महिला बँधी नहीं रहना चाहती, क्योंकि उसे अकसर यह विश्वास दिलाया जाता है कि मातृत्व ही महिला होने की परिभाषा है। अपने अनुभवों के माध्यम से निकिता ने निःसंतान दंपतियों के जीवन की एक ईमानदार झलक प्रस्तुत करने का प्रयास किया है-ऐसे जीवन, जो अकसर आत्म-संदेह, कम आत्मसम्मान, पीड़ा, आघात और संघर्षों से भरे होते हैं।
इस पुस्तक में निकिता ने अपने उस आक्रोश को भी खुलकर व्यक्त किया है, जो तब सामने आता है, जब किसी महिला का शोषण किया जाता है; जब उसके गर्भधारण में सहायता करने के प्रयास विफल हो जाते हैं; और जब वह महिला गर्भधारण कर लेती है तो उसके आसपास के लोगों में जो ईर्ष्या और पीड़ा उत्पन्न होती है। साथ ही निःसंतानता की पीड़ा को नजरअंदाज करने वाली सामाजिक व्यवस्था के प्रति गहरी व्यथा भी इसमें दिखाई देती है।"