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"क्या जीवन केवल सफल होने का नाम है या सार्थक होने का भी ? हर सुबह हम उठते तो हैं, पर क्या हमने कभी स्वयं से पूछा है- मैं क्यों जी रहा हूँ? मेरा जीवन किस उद्देश्य के लिए है ?
'इकिगाई की भारतीय चेतना' इसी शाश्वत प्रश्न की खोज का एक भारतीय उत्तर है। यह पुस्तक जापान की विश्वप्रसिद्ध इकिगाई अवधारणा और भारत की सनातन ज्ञान-परंपरा के मध्य एक अद्भुत सेतु का निर्माण करती है। जहाँ जापानी दर्शन जीवन में आनंद, संतुलन और उद्देश्य की खोज का मार्ग दिखाता है, वहीं भारतीय दर्शन उसे स्वधर्म, निष्काम कर्म, लोकसंग्रह और आत्मबोध की व्यापक चेतना से जोड़ता है।
भगवद्गीता का कर्मयोग, रामायण की मर्यादा, उपनिषदों का आत्मज्ञान, पंचतंत्र की व्यावहारिक बुद्धि, भारतीय लोककथाएँ, चार पुरुषार्थ, राष्ट्रचेतना और भारतीय जीवन-दर्शन इस पुस्तक में आधुनिक संदर्भों के साथ सहज रूप से जुड़े हैं। साथ ही कॅरियर चयन, मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक समरसता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जनसेवा और युवाओं के जीवन-संघर्ष जैसे समकालीन विषयों पर भी भारतीय दृष्टि से विचार प्रस्तुत किए गए हैं।
सरल और बोधगम्य भाषा में लिखी गई यह पुस्तक केवल इकिगाई को समझाती नहीं, बल्कि पाठक को अपने जीवन का उद्देश्य खोजने, अपने कर्तव्य को पहचानने और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के साथ एक संतुलित, आनंदमय और सार्थक जीवन जीने की प्रेरणा देती है। यह पुस्तक केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि जीवन को समझने, स्वयं को पहचानने और भारतीय चेतना के साथ जीने का आमंत्रण है।"