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"होगी जय गी जय... हे पुरुषोत्तम नवीन !' आपको भीड़ से निकालकर एक व्यक्ति के रूप में स्थापित करती है, आपके अंदर की असीम संभावनाओं की तलाश करती है तथा आपके अदम्य साहस एवं कभी भी हार नहीं मानने के जज्बे से आपका परिचय कराती है। पुस्तक आपको सफलता के मार्ग पर ले जाती है, चलना सिखाती है एवं व्यक्ति से व्यक्तित्व बनने का गुर सिखलाती है। पुस्तक इस सत्य पर प्रकाश डालती है कि आप ईश्वर की अप्रतिम रचना हैं, आपके जैसा व्यक्ति न पहले कभी हुआ है और न कभी होगा। आपका जन्म सिर्फ दूसरों के लिए तालियाँ बजाने के लिए नहीं हुआ है, आप स्वयं अपनी अलग लकीर खींच सकते हैं, अपनी अलग पहचान बना सकते हैं। यही इस पुस्तक का केंद्रीय तत्त्व है एवं मौलिकता भी।
यह पुस्तक आपको आपकी मौलिक शक्तियों से परिचय कराती है एवं आपकी संपूर्ण यात्रा में एक दीपक की तरह आपका मार्ग प्रशस्त करती है।"