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Hindi Ka ‘Shukla’ Paksha   

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Author Acharya Ramchandra Shukla
Features
  • ISBN : 9788168342200
  • Language : Hindi
  • Publisher : Prabhat Prakashan
  • Edition : 1st
  • ...more

More Information

  • Acharya Ramchandra Shukla
  • 9788168342200
  • Hindi
  • Prabhat Prakashan
  • 1st
  • 2026
  • 224
  • Soft Cover
  • 250 Grams

Description

"आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी के शीर्षस्थ रचनाकार हैं। उनकी मान्यताओं और स्थापनाओं पर हिंदी साहित्य में अब भी विचार होता ही रहता है। हिंदी की कक्षाओं में रामचंद्र शुक्ल के प्रतिमानों के वृत्त में ही छात्रों को पढ़ाया जाता है। कविता, कहानी और आलोचना पर उनके लिखे की काट करने का बहुत प्रयास किया गया, लेकिन हिंदी का ये हिरामन आज भी अपनी स्थापनाओं के साथ मजबूती से डटा है। आचार्य शुक्ल ने हिंदी-उर्दू संबंधों पर विपुल लेखन किया था।

स्वाधीनता पूर्व हिंदी-उर्दू विवाद पर उनके लेख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते थे। सन् 1908 से लेकर सन् 1917 तक के कालखंड में उनके अनेक लेख हिंदी-उर्दू को केंद्र में रखकर लिखे गए। उस समय जो विवाद उठे थे, शुक्लजी ने उनमें सार्थक हस्तक्षेप किया था।

स्वाधीनता के बाद उर्दू को लेकर शुक्लजी के मंतव्य पर अधिक चर्चा नहीं हुई या नहीं होने दी गई। आचार्य शुक्ल ने अपने उन लेखों में तर्कों के आधार पर साबित किया था कि किस तरह से उर्दू को स्थापित करने के लिए भारतीय भाषाओं को नेपथ्य में डालने की कोशिशें हुई थीं। इस पुस्तक में आचार्य शुक्ल के उन लेखों को एक जगह संकलित किया गया है जिससे हिंदी-उर्दू के ऐतिहासिक संदर्भों को लेकर एक ठोस समझ विकसित हो सके।"

The Author

Acharya Ramchandra Shukla

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म सन् 1884 को बस्ती जिले के अगोना गाँव में हुआ। सन् 1901 में प्रयाग के कायस्थ पाठशाला इंटर कॉलेज में एफ.ए. पढ़ने के लिए गए, परंतु गणित में कमजोर होने के कारण शीघ्र ही उसे छोड़कर ‘लीडरशिप’ की परीक्षा पास करनी चाही, उसमें भी वे असफल रहे। परंतु इन परीक्षाओं की सफलता या असफलता से अलग वे बराबर साहित्य, मनोविज्ञान, इतिहास आदि के अध्ययन में लगे रहे। उन्होंने हिंदी, उर्दू, संस्कृत एवं अंग्रेजी के साहित्य का गहन अनुशीलन किया।
उन्होंने ‘हिंदी शब्द सागर’ के साथ ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ का संपादन भी किया। सन् 1937 ई. में वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी-विभागाध्यक्ष नियुक्त हुए एवं इस पद पर रहते हुए ही सन् 1941 में उनकी हृदय गति रुक जाने से मृत्यु हो गई। 
उन्होंने ब्रजभाषा और खड़ीबोली में फुटकर कविताएँ लिखीं तथा एडविन आर्नल्ड के ‘लाइट ऑफ एशिया’ का ‘बुद्ध चरित’ के नाम ब्रजभाषा में पद्यानुवाद से किया। मनोविज्ञान, इतिहास, संस्कृति, शिक्षा एवं व्यवहार संबंधी लेखों एवं पत्रिकाओं के भी अनुवाद किए हैं। दर्शन के क्षेत्र में भी उनकी ‘विश्व प्रपंच’ पुस्तक उपलब्ध है। संपूर्ण लेखन में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण एवं कालजयी रूप समीक्षक, निबंध-लेखक एवं साहित्यिक इतिहासकार के रूप में प्रकट हुआ।

 

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