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"भारतीय दर्शन में प्राणी के द्वारा किए गए पुण्य और पाप कर्मों के समुच्चय को ही 'अदृष्ट' कहते हैं। इसी अदृष्ट के माध्यम से कर्मफल मिलता है। ईश्वर इस अदृष्ट का प्रेरक है। हिंदू धर्म में अदृष्ट का व्यावहारिक अर्थ ईश्वर की इच्छा' है। यह दिखाई नहीं देता है, इसलिए इसे अदृष्ट कहते हैं। इसे प्रत्येक आत्मा में गुप्त रूप से विराजमान माना जाता है। पारंपरिक रूप से इसे प्राणी के प्रारब्ध, भाग्य, होनी आदि के पर्यायवाची के रूप में प्रयोग किया जाता रहा है।
इस पुस्तक में अदृष्ट के अर्थ को और अधिक व्यापक रूप में ग्रहण किया गया है। यहाँ इसे 'शिव का ब्रह्मांडीय नृत्य' के रूप में समझाया गया है। इस सृष्टि की सूक्ष्म से सूक्ष्म घटना से लेकर विराट्-से-विराट् घटना शिव का नृत्य है। यहाँ सबकुछ पूर्व निर्धारित है। इस प्रकृति की प्रत्येक घटना पूरी तरह ईश्वर के नियंत्रण में है।
सामान्य व्यक्ति से लेकर बड़े-बड़े संगठन, पार्टी, राष्ट्र आदि सभी प्रकृति के बनाए रिदमिक साइकल पर थिरक रहे हैं। इस पुस्तक में इसे ही विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से समझाया गया है। शिव के ब्रह्मांडीय नृत्य को समझने के लिए ज्योतिष भी एक सशक्त माध्यम है। इसलिए इस पुस्तक में उसका भी उपयोग किया गया है। हमारे युवाओं को भ्रमित किया जाता है कि ज्योतिष पश्चिमी देशों से भारत में आयातित है। इस पुस्तक में 'भारतीय ज्योतिष: वैदिक या विदेशी' लेख में यह स्थापित किया गया है कि ज्योतिष का आदिम स्रोत भारत ही रहा है। यह यहीं से निकलकर विश्व में फैलता चला गया।"