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"सेना परिवेश में पूरा देश एक साथ दिखाई देता है। इसी माहौल को लेखिका वंदना यादव ने एक सैनिक पत्नी की तरह जीया मगर अपने आस-पास की महिला अधिकारियों से इसके दूसरे रूप को जाना।
घर की लाड़ली बिटिया का हाड़तोड़ ट्रेनिंग के बाद सैनिक बनना। सेना पुरुषों का अधिकार क्षेत्र है, इस दुनिया में अपने कदम जमाना। जंगलों-पर्वतों में ऑपरेशन और कोविड के समय 'वर्क फॉर नेशन' करना। ऑपरेशन सिंदूर में दुश्मन के छक्के छुड़ाना। 'फेमिना' पत्रिका द्वारा इनकी बहादुरी को कवर पेज पर सेलिब्रेट करना।
महिला सैनिकों के जीवन को जानने-समझने का मौका आसानी से नहीं मिलता। एक अल्हड़ युवती का सैनिक के रूप में कायापलट कैसा रहा होगा! यह और ऐसे अनेक सवाल सबके मन में आते हैं। महिला सैन्य अधिकारी का जीवन कैसा होता है, इस बारे में जानने की चाह होती है। इसी मंशा को पूरा करने के उद्देश्य से इस पुस्तक की रचना हुई है।
भारतीय सेना अपनी बहादुरी, त्याग और बलिदान के लिए पहचानी जाती है। यहाँ स्त्री-पुरुष के भेद के बिना जिम्मेदारी तय होती है। जबकि महिलाओं से उम्मीद होती है कि वह परिवार और रिश्तों के लिए संवेदनशील रहकर खाद-पानी का काम करती रहें। इससे उलट सैनिक की वरदी सबसे पहले संवेदनशीलता से दूरी बनाने की ट्रेनिंग देती है। यह जीवन 'सेल्फलैस' होने की माँग करता है। महिलाएँ पीढ़ियों से परिवार को सर्वोपरि मानती आई हैं। इस सोच से जुड़ी महिलाओं का सैनिक बनना क्या आसान रहा होगा ? सैनिक बनने की कठोर प्रैक्टिस ने इन महिलाओं को कैसे सोने से कुंदन बनाया ! यह और ऐसे अनेक सवाल-जवाब इस पुस्तक में शामिल हैं।"