₹400
"एक दिन मैंने गलती से फिलॉसफी की किताब चबा ली, स्वाद तो उसका बाकी कागजों जैसा ही था, पर पता नहीं क्या हुआ उस दिन, मेरा मन हर चीज से उचट गया ! मुझे लगने लगा कि हम जी ही क्यों रहे हैं, क्यों इतना मोह पाल रहे हैं, क्या हासिल होता है मुझे भौंकने और काटने से ?
इस तरह के विचारों ने मेरी बुद्धि पर वैराग्य का पर्दा डाल दिया और मैं चुपचाप शांत भाव से बड़े वाले काले सोफे पर पसर गया। इन सोफों पर मेहमानों से ज्यादा मैं बैठा करता था क्योंकि मेरे डर से हमारे घर मेहमान आते ही नहीं थे।"