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परम वैभव के लिए सर्वांग स्वतंत्रता अखंड भारत भारतीयों के लिए भूमि का टुकड़ा न होकर एक चैतन्यमयी देवी भारतमाता है। जब तक भारत का भूगोल, संविधान, शिक्षाप्रणाली, आर्थिक नीति, संस्कृति, समाज-रचना, परसा एवं विदेशी विचारधारा से प्रभावित और पश्चिम के अंधानुकरण पर आधारित रहेंगे, तब तक भारत की पूर्ण स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगता रहेगा। स्वाधीन भारत में महात्मा गांधीजी के वैचारिक आधार स्वदेश, स्वदेशी, स्वधर्म, स्वभाषा, स्वसंस्कृति, रामराज्य, ग्राम स्वराज इत्यादि को तिलांजलि दे दी गई। स्वाधीन भारत में मानसिक पराधीनता का बोलबाला है। देश को बाँटने वाली विधर्मी/विदेशी मानसिकता के फलस्वरूप देश में अलगाववाद, अतंकवाद, भ्रष्टाचार, सामाजिक विषमता आदि पाँव पसार चुकी हैं। संघ जैसी संस्थाएँ सतर्क हैं। परिवर्तन की लहर चल पड़ी है। देश की सर्वांग स्वतंत्रता अवश्यंभावी है।
गांधीजी की इच्छा के विरुद्ध भारत-विभाजन के साथ खंडित राजनीतिक स्वाधीनता स्वीकार करके कांगे्रस का सारा नेतृत्व सासीन हो गया। दूसरी ओर संघ अपने जन्मकाल से आज तक ‘अखंड भारत’ की ‘सर्वांग स्वतंत्रता’ के ध्येय पर अटल रहकर निरंतर गतिशील है।
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अनुक्रम
आशीर्वचन—7
प्रस्तावना—9
आभार-अभिनंदन—15
1. ब्रिटिश साम्राज्यवाद पर प्रथम सशक्त प्रहार—21
2. अंग्रेजों का ‘सुरक्षा कवच’ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस —34
3. आंदोलनकारी कांग्रेस के ध्वजवाहक महात्मा गांधी—43
4. ए.ओ. ह्यूम की कांग्रेस और डॉ. हेडगेवार का संघ—53
5. बाल स्वतंत्रता सेनानी—63
6. विप्लवी स्वतंत्रता सेनानी—80
7. वीरव्रती स्वतंत्रता-सेनानी—96
8. चिंतनशील स्वतंत्रता सेनानी—120
9. स्वयंसेवक स्वतंत्रता सेनानी—135
10. परिव्राजक स्वतंत्रता सेनानी—155
11. भविष्यदृष्टा स्वतंत्रता सेनानी—173
12. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अग्रदूत सरसंघचालक श्रीगुरुजी—184
13. सनातन राष्ट्र का दुखित विभाजन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ—196
14. स्वतंत्रता के बाद ‘स्वातंत्र्य रक्षा’ के अग्रिम मोर्चों पर संघ स्वयंसेवक—208
15. राष्ट्रीय स्वाभिमान की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए संघर्षरत वीरव्रती-स्वयंसेवक—226
16. परम वैभव के लिए सर्वांग स्वतंत्रता—239
17. ध्येय की ओर बढ़ते कदम—261
संदर्भ-सामग्री—268
नरेंद्र सहगल—शिक्षा : पंजाब विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र एवं इतिहास में एम.ए.।
कृतित्व : 1970-72 में दो वर्षों तक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के हरियाणा प्रदेश संगठन मंत्री के रूप में कार्य करने के पश्चात् 1982 तक दिल्ली व पंजाब में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रचारक के रूप में कार्य; 1970-72 में कुरुक्षेत्र से प्रकाशित 'तरुण दीप' मासिक का संपादन किया। 1981-83 में चंडीगढ़ से निकलने वाले 'रवानी' पंजाबी और 'पथिक' हिंदी मासिक पत्रों के संपादक रहे तथा 1983-89 तक 'तवी दीपिका' जम्मू के संपादक व संचालक रहे। तत्पश्चात् सात वर्षों तक दैनिक भास्कर में जम्मू-कश्मीर के ब्यूरो चीफ रहे।
प्रकाशन : 'पंजाब समस्या और उपाय', 'धर्मांतरित कश्मीर', 'कन्वर्टेड कश्मीर', 'घाटी के स्वर', 'राम अर्थात् राष्ट्र', 'सुरक्षा स्वदेश की', 'आस्था पर आघात', 'आस्था की विजय', 'भारत का राष्ट्रीय उद्घोष : जय श्रीराम', 'विक्टोरी ऑफ़ फेथ' एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित।