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"भावों की शब्दों में प्रस्तुति आंशिक रूप में ही हो पाती है। साधारणतः इस भाव सागर से प्रत्यक्ष शब्द रूप अँजुरी भर ही निकल पाता है और शेष समय और परिस्थिति के प्रभाव से अग्राह्य रह जाता है। कवि की रवि से तुलना उसकी भावों को शब्दों में रूपांतरण और कल्पना विस्तार की क्षमता के कारण ही की जाती है। जितनी यहाँ व्यापकता उतना प्रभावी सामर्थ्य ! उर्वशी जी ने यही वृहद् विस्तीर्णता मनोभावों के शाब्दिक रूपांतरण में सहजता से पिरो दी है।
विहीनता और गहनता का विस्मयकारी जुड़ाव यहाँ स्पष्टतः दृष्टव्य है। अंतर्भावों के कितने उद्वेग और परिमाण से निकली होंगी ये शब्द वाहिनियाँ ! कितने मंथन का परिणाम रहा होगा यह उत्पाद !
उर्वशी जी ने इस पुस्तक 'अंतर्मन की पाती : सुनो ना' द्वारा आधुनिक कविता के उत्परिवर्तित रूप को गहन भावों के भौतिकता में प्रकटन का माध्यम बनाया है। गंभीरता और गहनता का सरलता व स्पष्टता में अनुवाद किया है।
नारी के मनोभावों को परिभाषित करती यह कृति पाठकवृंद को भेजी एक परिष्कृत पाती है, जो सुपाठ्य व धनाढ्य है। कवयित्री ने भाषा-सौंदर्य, वैशिष्ट्य व समृद्ध साहित्यिक परंपरा का निर्वहन किया है। उनकी प्रकाशित पुस्तकों में विभिन्न भाषा-शैलियों का प्रयोग लेखन परिपक्वता का परिचायक है।"
डॉ. उर्वशी अग्रवाल 'उर्वी'—शब्द ही ब्रह्मांड है और ब्रह्मांड ही शब्द है। यदि ब्रह्मांड न होता तो शब्द न होता और यदि शब्द न होता तो संभवतः यह ब्रह्मांड भी न होता। आदिकाल से ही शब्द का एक विशेष महत्त्व है और मैंने एक कवि रूप में शब्दों के इसी महत्त्व को समझा और पाया कि सही शब्दों के चयन से और व भी पद्य रूप में अधिक प्रभाव डालता है और बस यहीं से मेरी काव्ययात्रा प्रारंभ हुई, जो निरंतर अविरल चल रही है।
गत कुछ वर्षों में सृष्टि के आशीर्वाद से कविता के साथ-साथ गीत-गजल, दोहा-चौपाई की विधा पर लिखना शुरू किया। महिला विषयों, विशेषकर उनकी विभिन्न भावनाओं को कविताओं, गजलों, दोहों और चौपाइयों के माध्यम से प्रस्तुत करती आ रही हूँ। हिंदी के अतिरिक्त सरैकी भाषा में भी काव्य सृजन। आकाशवाणी द्वारा आयोजित हिंदी व सरैकी के कई काव्य प्रसारणों व कविता पाठ में सम्मिलित हुई हूँ। अनेक टी.वी. चैनलों के कार्यक्रमों में कविताएँ व गजलें प्रस्तुत की हैं। अब तक लगभग एक हजार से अधिक हिंदी कविताओं व पच्चीस सौ से अधिक दोहों का सृजन ।
लड़कियों व महिलाओं को सुरक्षा के प्रति जागरूक करने के लिए अपनी 'हर नारी की अंतर्वेदना मे तो' कविता के माध्यम से विभिन्न विद्यालयों, कॉलेजों आदि में कार्यशालाओं में प्रस्तुति की है, जो काफी चर्चित रही है और जिनकी लगातार माँग रहती है।
प्रकाशित कृतियाँ : व्यथा कहे पांचाली, मैं शबरी हूँ राम की, अंतर्मन की पाती : सुनो ना ! हँसली चाँद की, यादों की कंदील, सारा कमाल उसका है, खुशबू तेरे खयाल की।
आगामी पुस्तकें : हर नारी की अंतर्वेदना : मी टू, बेटी तू दुर्गा बन जाना, मैंने कहा''' उसने कहा''', पाँच गजल-संग्रह।
संप्रति : वर्तमान में सुविख्यात हिंदी साहित्यिक पत्रिका 'साहित्य अमृत' की उप-संपादिका हैं।
अध्यक्षा: Defence and Security Alert (DSA) Magazine