Acharya Mahapragya

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आचार्य महाप्रज्ञ विश्‍व भर के जैन धर्म के चिंतकों में अग्रणी स्थान रखते हैं और जैन श्‍वेतांबर तेरापंथ के दसवें आचार्य हैं। सन् 1920 में राजस्थान के एक गाँव में जनमे आचार्य महाप्रज्ञ दस वर्ष की आयु में भिक्षु बन गए। उनकी शिक्षा-दीक्षा आचार्य श्री तुलसी के मार्गदर्शन में संपन्न हुई, जिन्होंने सन् 1949 में विश्‍व में अहिंसा, घृणा और पृथक्‍ता के भाव से मुक्‍त धर्म के प्रचार के लिए अणुव्रत आंदोलन का सूत्रपात किया। आचार्य महाप्रज्ञ का व्यक्‍तित्व बहुआयामी है और वे भारतीय तथा पश्‍च‌िमी धर्म व दर्शन के सुविख्यात अध्येता हैं। अनेक पुस्तकों के लेखक आचार्यश्री को ‘आधुनिक विवेकानंद’ भी कहा जाता है। अहिंसा का संदेश फैलाने के लिए वे पैदल ही 1 लाख किलोमीटर और 10 हजार गाँवों का भ्रमण कर चुके हैं। इसी उद‍्देश्य से उन्होंने वर्ष 2001 में ‘अहिंसा यात्रा’ प्रारंभ की। सांप्रदायिक सौहार्द के लिए किए गए कार्यों में उनके विशिष्‍ट योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2004 में ‘कम्यूनल हार्मोनी अवार्ड’ से सम्मानित किया गया।

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