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Yogasan Aur Shareer Vigyan   

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Author Swami Akshey Atmanand
Features
  • ISBN : 9789383111824
  • Language : Hindi
  • Publisher : Prabhat Prakashan
  • Edition : 1st
  • ...more

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  • Swami Akshey Atmanand
  • 9789383111824
  • Hindi
  • Prabhat Prakashan
  • 1st
  • 2017
  • 180
  • Hard Cover

Description

शरीर आत्मा का आधार है, पड़ाव है, विश्रामस्थल है, मंजिल नहीं; फिर भी मंजिल न मिलने तक उसे इस आधार की आवश्यकता है । रुकने और विश्राम करने की, अपने आपको तरोताजा करने की, अपनी हँसी-खुशी, स्वास्थ्य-सुविधा बनाए रखने की उसे महती आवश्यकता है, ताकि वह एक दिन अपनी मंजिल पा सके ।
इस पुस्तक में शरीर विज्ञान एवं योगासन संबंधी अनेक उपयोगी जानकारियाँ दी गई हैं । चित्रों सहित विषय को समझने की सर्वथा एक नवीन शैली में प्रस्तुति इसलिए उपयुक्‍त लगेगी कि आप इसे अपनी मुविधा के अनुसार पढ़-समझ सकेंगे । आप मनन कर, इसका पालन कर सकने का संकल्प लें, निरंतर अपनी यात्रा जारी रखें और एक दिन अपनी मंजिल पा लें ।
पुस्तक में योगासनों के साथ-साथ कुछ ऐसी सामग्रियों का भी समावेश किया गया है, जिनके मनन मात्र से आपका जीवन असीम कार्यक्षमता और आनंदमय उल्लास से भर उठेगा ।
अति सरल भाषा, विशिष्‍ट शैली, गंभीर वैज्ञानिक विश्‍लेषण और सुबोध व्याख्या स्वामी अक्षय आत्मानंदजी की पुस्तकों की ऐसी विशेषताएँ हैं, जिनसे पाठक उनकी योग संबंधी पुस्तकों को रुचिपूर्वक पढ़ते हैं ।
हमें पूर्ण विश्‍वास है कि प्रस्तुत पुसाक को पढ़ने के बाद आप भी योग-विद्या में स्वयं को प्रवीण पाएँगे ।

The Author

Swami Akshey Atmanand

वर्तमान जीवन-व्यवस्था ऐसी हो गई है कि आज लगभग प्रत्येक व्यक्‍त‌ि किसी- न-किसी रोग से ग्रस्त है । जिन रोगों के बारे में हमने कभी सुना भी नहीं था, अब उन्हें देखना ही नहीं, भोगना भी हमारी विवशता बनती जा रही है । संपूर्ण संसार में हजारों चिकित्सा-पद्धतियाँ विकसित हो चुकी हैं । इनके साथ-साथ उन्नत चिकित्सकीय यंत्र एवं उपकरण तथा अद‍्भुत जीवन रक्षक दवाएँ विकसित कर ली गई हैं, फिर भी आज का मानव नाना रोगों से पीड़ित जीने को विवश है । अत : इन रोगों का कारण क्या है, यह जानना अत्यावश्यक हो गया है । इसका प्रमुख कारण है-हमारा असंयमित- असंतुलित आहार ।
हमें क्या खाना चाहिए, क्यों खाना चाहिए, कब खाना चाहिए, कितना खाना चाहिए-ऐसे अनेक गंभीर प्रश्‍नों का समाधान स्वामीजी ने प्रस्तुत पुस्तक ' आहार चिकित्सा ' में बड़ी ही सरल, सुगम व बोधगम्य भाषा में प्रभावपूर्ण ढंग से किया है । स्वामीजी का मानना है कि दैनिक खान- पान से ही अच्छा उपचार किया जा सकता है । स्वामीजी द्वारा सुझाई गई बातों को अगर आप ध्यानपूर्वक आत्मसात‍् करेंगे, धैर्य और शांति से उनका अनुसरण करेंगे तो निश्‍चय ही बीमार होने की नौबत नहीं आएगी । 
हमें विश्‍वास है, प्रस्तुत पुस्तक पाठकों का आहार चिकित्सा संबंधी ज्ञानवर्द्धन तो करेगी ही, उन्हें पूर्णतया स्वस्थ रखने में भी महती भूमिका अदा करेगी ।

 

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