Main Vivekanand Bol Raha Hoon

Main Vivekanand Bol Raha Hoon   

Author: Giriraj Sharan
ISBN: 9789380823201
Language: Hindi
Publisher: Prabhat Prakashan
Edition: 1st
Publication Year: 2013
Pages: 144
Binding Style: Hard Cover
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Description

भारतीय आध्यात्मिक चेतना के सिरमौर स्वामी विवेकानंद अद्भुत मेधा के स्वामी थे। उन्होंने कहा था कि सारे अनर्थों की जड़ है हमारी गरीबी। स्वामीजी दरिद्रनारायण के दुखों से द्रवित और दलितवर्ग के प्रति किए जानेवाले अन्याय से व्यथित थे। वे जाति-पाँति के घोर विरोधी थे और इसे सामाजिक जीवन का घोर कलंक मानते थे। स्वामीजी का विश्वास था कि प्रत्येक राष्ट्र को अपनी नारी-जाति का सम्मान करना चाहिए। उनकी मान्यता थी कि भारत के सर्वसाधारण में यदि धर्म का संचार हो जाए, तो हम छोटी-छोटी समस्याओं से सहज में ही मुक्त हो जाएँगे।
स्वामीजी धर्मपुरुष थे और भारतीय संस्कृति के सजग प्रहरी। वे कट्टर राष्ट्रवादी थे, किंतु उनका राष्ट्रवाद मानवता का पोषक था। स्वामीजी ने धर्म और संस्कृति का निदान करते हुए सोए हुए भारत को उसके गौरवशाली अतीत से परिचित कराया। वेदों और उपनिषदों के प्राचीन आत्मज्ञान के संदेश को पाश्चात्य देशों तक गुंजारित किया।
वेदांत के अद्वितीय प्रचारक, भारतीय संस्कृति के विशिष्ट उद्घोषक, मानवता के महान् पोषक, दूरदर्शी विचारक स्वामी विवेकानंद के विचार देश की भावी युवा पीढ़ी के लिए पथ-प्रदर्शक का कार्य करेंगे। इसी भावना और शुभ संकल्प के साथ स्वामीजी के विचारों का यह संकलन प्रस्तुत है।

The Author
Giriraj SharanGiriraj Sharan

जन्म : सन् 1944, संभल ( उप्र.) ।
डॉ. अग्रवाल की पहली पुस्तक सन् 1964 में प्रकाशित हुई । तब से अनवरत साहित्य- साधना में रत आपके द्वारा लिखित एवं संपादित एक सौ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । आपने साहित्य की लगभग प्रत्येक विधा में लेखन-कार्य किया है । हिंदी गजल में आपकी सूक्ष्म और धारदार सोच को गंभीरता के साथ स्वीकार किया गया है । कहानी, एकांकी, व्यंग्य, ललित निबंध, कोश और बाल साहित्य के लेखन में संलग्न डॉ. अग्रवाल वर्तमान में वर्धमान स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बिजनौर में हिंदी विभाग में रीडर एवं अध्यक्ष हैं । हिंदी शोध तथा संदर्भ साहित्य की दृष्‍ट‌ि से प्रकाशित उनके विशिष्‍ट ग्रंथों-' शोध संदर्भ ' ' सूर साहित्य संदर्भ ', ' हिंदी साहित्यकार संदर्भ कोश '-को गौरवपूर्ण स्थान प्राप्‍त हुआ है ।
पुरस्कार-सम्मान : उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा व्यंग्य कृति ' बाबू झोलानाथ ' (1998) तथा ' राजनीति में गिरगिटवाद ' (2002) पुरस्कृत, राष्‍ट्रीय मानवाधिकार आयोग, नई दिल्ली द्वारा ' मानवाधिकार : दशा और दिशा ' ( 1999) पर प्रथम पुरस्कार, ' आओ अतीत में चलें ' पर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ का ' सूर पुरस्कार ' एवं डॉ. रतनलाल शर्मा स्मृति ट्रस्ट द्वारा प्रथम पुरस्कार । अखिल भारतीय टेपा सम्मेलन, उज्जैन द्वारा सहस्राब्दी सम्मान ( 2000); अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानोपाधियाँ प्रदत्त ।

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